ज्योति बिन्दु स्वरूप पत्र-पुष्प निमित्त टीचर्स तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण परिवार प्रति मधुर यादपत्र
“ज्वालामुखी याद द्वारा प्रकृति और आत्माओं के तमोगुण को भस्म करो"
प्राणप्यारे अव्यक्तमूर्त मात-पिता बापदादा के अति स्नेही, सदा अपनी रूहानी शान में रह सर्व की परेशानियों को समाप्त करने वाले, संगठित रूप में मन-बुद्धि की एकाग्रता द्वारा पावरफुल योग के वायब्रेशन चारों ओर फैलाने वाले, निमित्त टीचर्स बहिनें तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद स्वीकार करना जी । बाद समाचार - जून मास में सभी ने अपनी मीठी मम्मा की स्मृतियों के साथ, उनकी विशेषताओं को सुनते स्वयं में समाते बहुत अच्छा पुरुषार्थ किया होगा। अभी यह जुलाई मास अपनी मीठी दीदी मनमोहिनी जी की स्मृति का मास है, दीदी जिनका नाम ही गोपी था, वे सदा बाबा के स्नेह में समाई रहती। उन्होंने अपनी निज़ी धारणाओं से पूरे दैवी परिवार की अलौकिक पालना की, सबको ईश्वरीय नियम मर्यादाओं में चलना सिखाया। सदा बुद्धि की लाइन क्लीन और क्लीयर होने कारण उनमें परखने और निर्णय करने की शक्ति ऐसी थी जो किसी भी आत्मा के तीनों कालों को परखकर उसे और योग्य बना देती । तो आज इस पत्र के साथ आपके पास दीदी मनमोहिनी जी की विशेषतायें और उनके द्वारा मिली हुई मधुर शिक्षाओं की कुछ प्वाइंटस भेजी जा रही हैं, जो आपको तीव्र पुरुषार्थ में बहुत मदद करेंगी। वैसे अभी यह जुलाई-अगस्त मास भारत के मौसम अनुसार सब तरफ बरसातें होती हैं, ऐसे समय पर हर एक सेवास्थान पर योग भट्ठियों के ही कार्यक्रम चलते हैं। अभी वर्तमान समय प्राणप्यारे बापदादा का विशेष इशारा है कि बच्चे, अब आपका योग ज्वाला-स्वरूप शक्तिशाली, लाइट माइट हाउस से सम्पन्न चाहिए, जिससे ही प्रकृति और आत्माओं का तमोगुण भस्म होगा। इसके लिए अपने ऊंचे स्वमान के स्मृति की सीट पर स्थित हो शक्तिशाली योग द्वारा पवित्रता की लाइट माइट चारों ओर फैलाओ। जितनी आपकी वृत्तियां शुभ व कल्याण की होंगी उतना अनेक तड़पती हुई दुःखी अशान्त आत्माओं को शान्ति और शक्ति की अनुभूति होगी। तो अब आवश्यकता है सेकण्ड में बिन्दु बन बिन्दु स्वरूप बाप को याद करने की। यह बिन्दु रूप की याद ही पावरफुल वायब्रेशन फैला सकती है। वैसे जैसे वर्तमान समय दुनिया में दुःखी, परेशान आत्माओं के मन में यह संकल्प उत्पन्न हो रहा है कि अब विनाश हो, आप विश्व-कल्याणकारी आत्माओं के मन में भी यह संकल्प उत्पन्न हो कि अब जल्दी ही सर्व का कल्याण हो तब ही समाप्ति होगी। बाबा कहते बच्चे, अब अपना दयालु, कृपालु, रहमदिल स्वरूप इमर्ज कर दुःखियों की पुकार सुनो और उन्हें मुक्ति का वरदान दो। तो बोलो, मीठे भाई बहिनें सदा इसी स्मृति में रह अपने-अपने सेवास्थानों को सभी ने तपस्या कुण्ड बनाया है ना! संगठित रूप में जब ऐसी शक्तिशाली याद होगी तब ही स्व-परिवर्तन से विश्व परिवर्तन का कार्य सम्पन्न होगा। अच्छा - आप सभी का स्वास्थ्य ठीक होगा। सभी मधुबन की भट्ठियों का भी पूरा-पूरा लाभ ले रहे होंगे। सभी को याद..... ईश्वरीय सेवा में, A के मोहिनी मुख्य प्रशासिका, ब्रह्माकुमारीज़
ये अव्यक्त इशारे ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो
1) आप महान तपस्वी आत्मायें ज्वाला रूप शक्तिशाली याद द्वारा प्राप्ति के किरणों की अनुभूति करो और कराओ। आपका तपस्वी स्वरूप औरों को देने का स्वरूप है। जैसे सूर्य विश्व को रोशनी देने की और अनेक विनाशी प्राप्तियों की अनूभूति कराता है ऐसे आप भी अपने तपस्वी स्वरूप द्वारा शान्ति और शक्ति की किरणें देते रहो।
2) आप बच्चों का योग जब ज्वाला स्वरूप शक्तिशाली होगा तब पवित्रता की अग्नि सेकण्ड में विश्व के किचड़े को भस्म कर सकेगी। पवित्रता की यह शक्ति महान शक्ति है । अन्त में जब आप सम्पूर्ण पवित्र हो जायेंगे तब आपके श्रेष्ठ संकल्प के लगन की अग्नि से यह सब किचड़ा भस्म हो जायेगा ।
3) अभी ज्वालामुखी बन आसुरी संस्कार, आसुरी स्वभाव सब-कुछ भस्म करो। जैसे देवियों के यादगार में दिखाते हैं कि ज्वाला से असुरों का संघार किया । असुर कोई व्यक्ति नहीं लेकिन आसुरी शक्तियों को खत्म किया। यह अभी आपकी ज्वालास्वरूप स्थिति का यादगार है। अब ऐसी योग की ज्वाला प्रज्जवलित करो जिसमें यह कलियुगी संसार जलकर भस्म हो जाये।
4) जैसे दुःखी आत्माओं के मन में यह आवाज शुरू हुआ है कि अब विनाश हो, वैसे ही आप विश्व कल्याणकारी आत्माओं के मन में यह संकल्प उत्पन्न हो कि अब जल्दी ही सर्व का कल्याण हो तब ही समाप्ति होगी। विनाशकारियों को कल्याणकारी आत्माओं के संकल्प का इशारा चाहिये इसलिए अपने एवर-रेडी बनने के पॉवरफुल संकल्प से ज्वाला रूप योग द्वारा विनाश ज्वाला को तेज करो।
5) जैसे सूर्य की किरणें फैलती हैं, वैसे ही मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज पर शक्तियों व विशेषताओं रूपी किरणें चारों ओर फैलती अनुभव करें, इसके लिए "मैं मास्टर सर्वशक्तिवान, विघ्न विनाशक आत्मा हूँ", इस ऊंचे स्वमान के स्मृति की सीट पर स्थित हो योग को ज्वाला रूप बनाओ तो कोई विघ्न सामने तक भी नहीं आ सकता ।
6) जब तक आपकी याद ज्वाला रूप नहीं बनी है तब तक यह विनाश की ज्वाला भी सम्पूर्ण ज्वाला रुप नहीं लेती है। यह भड़कती है, फिर शीतल हो जाती है क्योंकि ज्वाला मूर्त और प्रेरक आधार-मूर्त आत्मायें अभी स्वयं ही सदा ज्वाला रूप नहीं बनी हैं। अब ज्वाला-रूप बनने का दृढ़ संकल्प लो और संगठित रूप में मन-बुद्धि की एकाग्रता द्वारा पावरफुल योग के वायब्रेशन चारों ओर फैलाओ।
7) ज्वाला-रूप बनने के लिए यही धुन सदा रहे कि अब वापिस घर जाना है। जाना है अर्थात् उपराम । जब अपने निराकारी घर जाना है तो वैसा अपना वेष बनाना है। तो जाना है और सबको वापस ले जाना है - इस स्मृति से स्वतः ही सर्व-सम्बन्ध, सर्व प्रकृति की आकर्षण से उपराम अर्थात् साक्षी बन जायेंगे। साक्षी बनने से सहज ही बाप के साथी व बाप-समान बन जायेंगे ।
8) जितना स्थापना के निमित्त बने हुए ज्वाला - रूप होंगे उतना ही विनाश-ज्वाला प्रत्यक्ष होगी। संगठन रूप में ज्वाला- रूप की याद विश्व के विनाश का कार्य सम्पन्न करेगी। इसके लिए हर सेवाकेन्द्र पर विशेष योग के प्रोग्राम चलते रहें तो विनाश ज्वाला को पंखा लगेगा। योग- अग्नि से विनाश की अग्नि जलेगी, ज्वाला से ज्वाला प्रज्जवलित होगी।
9) लास्ट सो फास्ट पुरुषार्थ ज्वाला-रूप का ही रहा हुआ है । पाण्डवों के कारण यादव रुके हुए हैं। पाण्डवों की श्रेष्ठ शान, रुहानी शान की स्थिति यादवों के परेशानी वाली परिस्थिति को समाप्त करेगी। तो अपनी शान से परेशान आत्माओं को शान्ति और चैन का वरदान दो। ज्वाला स्वरूप अर्थात् लाइट हाउस और माइट हाउस स्थिति को समझते हुए इसी पुरुषार्थ में रहो ।
10) विशेष याद की यात्रा को पॉवरफुल बनाओ, ज्ञान- स्वरुप के अनुभवी बनो। आप श्रेष्ठ आत्माओं की शुभ वृत्ति व कल्याण की वृत्ति और शक्तिशाली वातावरण अनेक तड़पती हुई, भटकती हुई, पुकार करने वाली आत्माओं को आनन्द, शान्ति और शक्ति की अनुभूति करायेगी ।
11) जैसे अग्नि में कोई भी चीज़ डालो तो नाम, रूप, गुण सब बदल जाता है, ऐसे जब बाप के याद के लगन की अग्नि में पड़ते हो तो परिवर्तन हो जाते हो। मनुष्य से ब्राह्मण बन जाते, फिर ब्राह्मण से फरिश्ता सो देवता बन जाते । लग्न की अग्नि से ऐसा परिवर्तन होता है जो अपनापन कुछ भी नहीं रहता, इसलिए याद को ही ज्वाला रूप कहा है।
12) अभी अच्छा-अच्छा कहते हैं, लेकिन अच्छा बनना है यह प्रेरणा नहीं मिल रही है। उसका एक ही साधन है - संगठित रुप में ज्वाला स्वरूप बनो। एक एक चैतन्य लाइट हाउस बनो। सेवाधारी हो, स्नेही हो, एक बल एक भरोसे वाले हो, यह तो सब ठीक है, लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज, स्टेज पर आ जाए तो सब आपके आगे परवाने के समान चक्र लगाने लगेंगे।
13) जैसे किला बांधा जाता है, जिससे प्रजा किले के अन्दर सेफ रहे। एक राजा के लिए कोठरी नहीं बनाते, किला बनाते हैं। आप सभी भी स्वयं के लिए, साथियों के लिए, अन्य आत्माओं के लिए ज्वाला रूप याद का किला बांधो। याद के शक्ति की ज्वाला हो तो हर आत्मा सेफ्टी का अनुभव करेगी।
14) पाप कटेश्वर वा पाप हरनी तब बन सकते हो जब याद ज्वाला स्वरूप होगी। इसी याद द्वारा अनेक आत्माओं की निर्बलता दूर होगी, इसके लिए हर सेकण्ड, हर श्वांस बाप और आप कम्बाइन्ड होकर रहो। कोई भी समय साधारण याद न हो । स्नेह और शक्ति दोनों रूप कम्बाइन्ड हो।
15) अभी निर्भय ज्वालामुखी बन प्रकृति और आत्माओं के अन्दर जो तमोगुण है उसे भस्म करो। तपस्या अर्थात् ज्वाला स्वरूप याद, इस याद द्वारा ही माया वा प्रकृति का विकराल रूप शीतल हो जायेगा। आपका तीसरा नेत्र, ज्वालामुखी नेत्र माया को शक्तिहीन कर देगा।
16) समय प्रमाण रहे हुए जो भी मन के, सम्बन्ध-सम्पर्क के हिसाब-किताब हैं उसे ज्वाला स्वरूप याद में भस्म करो। लगन है, इसमें बापदादा भी पास करते हैं लेकिन अभी लगन को अग्नि रूप में लाओ। विश्व में जो चारों ओर भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि जल रही है वह आप बच्चों के योग अग्नि से, ज्वाला रूप याद से समाप्त हो जायेगी।
17) पावरफुल योग अर्थात् लगन की अग्नि, ज्वाला रूप की याद ही भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि को समाप्त करेगी और सर्व आत्माओं को सहयोग देगी, इससे ही बेहद की वैराग्य वृत्ति प्रज्वलित होगी। याद की अग्नि एक तरफ उस अग्नि को समाप्त करेगी दूसरी तरफ आत्माओं को परमात्म सन्देश की, शीतल स्वरूप की अनुभूति करोयगी, इससे ही आत्मायें पापों की आग से मुक्त हो सकेंगी।
18 ) समय प्रमाण अब सर्व ब्राह्मण आत्माओं को समीप लाते हुए ज्वाला स्वरूप का वायुमण्डल बनाने की सेवा करो, उसके लिए चाहे भट्ठियां करो या आपस में संगठित होकर रूहरिहान करो लेकिन ज्वाला स्वरूप का अनुभव करो और कराओ, इस सेवा में लग जाओ तो छोटी-छोटी बातें सहज परिवर्तन हो जायेंगी।
19) योग को ज्वाला रूप बनाने के लिए सेकण्ड में बिन्दी स्वरूप बन मन-बुद्धि को एकाग्र करने का अभ्यास बार-बार करो। स्टॉप कहा और सेकण्ड में व्यर्थ देह-भान से मन- बुद्धि एकाग्र हो जाए। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर सारे दिन में यूज़ करो । पावरफुल ब्रेक द्वारा मन-बुद्धि को कन्ट्रोल करो, जहाँ मन-बुद्धि को लगाना चाहो वहाँ सेकण्ड में लग जाए।
20) योग माना शान्ति की शक्ति । यह शान्ति की शक्ति बहुत सहज स्व को और दूसरों को परिवर्तन करती है, इससे व्यक्ति भी बदल जायेंगे तो प्रकृति भी बदल जायेगी। व्यक्तियों को तो मुख का कोर्स करा लेते हो लेकिन प्रकृति को बदलने के लिए शान्ति की शक्ति अर्थात् योगबल ही चाहिए। योग में जब और सब संकल्प शान्त हो जाते हैं, एक ही संकल्प रहता ‘“बाप और मैं’” इसी को ही पावरफुल योग कहते हैं । बाप के मिलन की अनुभूति के सिवाए और सब संकल्प समा जायें तब कहेंगे ज्वाला रूप की याद, जिससे परिवर्तन होता है ।
21) जब योग में बैठते हो तो समाने की शक्ति सेकण्ड में यूज़ करो। सेवा के संकल्प भी समा जाएं इतनी शक्ति हो जो स्टॉप कहा और स्टॉप हो जाए। फुल ब्रेक लगे, ढीली ब्रेक नहीं। अगर एक सेकण्ड के बजाए ज्यादा समय लग जाता है तो समाने की शक्ति कमजोर कहंगे । पावरफुल मन की निशानी है सेकण्ड में जहाँ चाहे वहाँ पहुंच जाए। मन को जब उड़ना आ गया, प्रैक्टिस हो गई तो सेकण्ड में जहाँ चाहे वहाँ पहुंच सकता है। अभी-अभी साकार वतन में, अभी-अभी परमधाम में, सेकण्ड की रफ्तार है - अब इसी अभ्यास को बढ़ाओ।
23) पावरफुल याद के लिए सच्चे दिल का प्यार चाहिए। सच्ची दिल वाले सेकण्ड में बिन्दु बन बिन्दु स्वरूप बाप को याद कर सकते हैं। सच्ची दिल वाले सच्चे साहेब को राज़ी करने के कारण, बाप की विशेष दुआयें प्राप्त करते हैं, जिससे सहज ही एक संकल्प में स्थित हो ज्वाला रूप की याद का अनुभव कर सकते हैं, पावरफुल वायब्रेशन फैला सकते हैं। सच्चाई की शक्ति के कारण दिमाग भी समय पर युक्तियुक्त, यथार्थ कार्य कराता है, कोई भी उल्टा कार्य हो नहीं सकता।
24) योग में सदा लाइट हाउस और माइट हाउस की स्थिति का अनुभव करो। ज्ञान है लाइट और योग है माइट । ज्ञान और योग - दोनों शक्तियां लाइट और माइट सम्पन्न हों इसको कहते हैं मास्टर सर्वशक्तिमान । ऐसी शक्तिशाली आत्मायें किसी भी परिस्थिति को सेकण्ड में पार कर लेती हैं। टाइम नहीं लगता।
25) ज्वाला स्वरूप की स्थिति का अनुभव करने के लिए निरन्तर याद की ज्वाला प्रज्वलित रहे। इसकी सहज विधि है - सदा अपने को “सारथी" और "साक्षी'' समझकर चलो। आत्मा इस रथ की सारथी है - यह स्मृति स्वत: ही इस रथ (देह) से वा किसी भी प्रकार के देहभान से न्यारा बना देती है। स्वयं को सारथी समझने से सर्व कर्मेन्द्रियाँ अपने कन्ट्रोल में रहती हैं । सूक्ष्म शक्तियां " मन-बुद्धि- संस्कार” भी ऑर्डर प्रमाण रहते हैं ।
26) सारथी अर्थात् आत्म- अभिमानी क्योंकि आत्मा ही सारथी है । ब्रह्मा बाप ने इस विधि से नम्बरवन की सिद्धि प्राप्त की। तो फॉलो फादर करो। जैसे बाप देह को अधीन कर प्रवेश होते अर्थात् सारथी बनते हैं देह के अधीन नहीं होते, इसलिए न्यारे और प्यारे हैं। ऐसे ही आप सभी ब्राह्मण आत्माएं भी बाप समान सारथी की स्थिति में रहो। सारथी स्वत: ही साक्षी हो कुछ भी करेंगे, देखेंगे, सुनेंगे और सब कुछ करते भी माया की लेप-छेप से निर्लेप रहेंगे।
27) कई बच्चे कहते हैं कि जब योग में बैठते हैं तो आत्म- अभिमानी होने के बदले सेवा याद आती है। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि लास्ट समय अगर अशरीरी बनने की बजाए सेवा का भी संकल्प चला तो सेकण्ड के पेपर में फेल हो जायेंगे। उस समय सिवाय बाप के, निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी - और कुछ याद नहीं । सेवा में फिर भी साकार में आ जायेंगे इसलिए जिस समय जो चाहे वह स्थिति हो नहीं तो धोखा मिल जायेगा ।
28) इस कलियुगी तमोप्रधान जड़जड़ीभूत वृक्ष की दुर्दशा देखते हुए ब्रह्मा बाप को संकल्प आता है कि अभी-अभी बच्चों के तपस्वी रूप द्वारा, योग अग्नि द्वारा इस पुराने वृक्ष को भस्म कर दें। परन्तु इसके लिए संगठित रूप में फुल फोर्स से योग ज्वाला प्रज्जवलित चाहिए। तो ब्रह्मा बाप के इस संकल्प को साकार में लाओ।
29) ज्वाला स्वरूप याद के लिए मन और बुद्धि दोनों को एक तो पावरफुल ब्रेक चाहिए और मोड़ने की भी शक्ति चाहिए। इससे बुद्धि की शक्ति वा कोई भी एनर्जी वेस्ट ना होकर जमा होती जायेगी। जितनी जमा होगी उतना ही परखने की, निर्णय करने की शक्ति बढ़ेगी। इसके लिए अब संकल्पों का बिस्तर बन्द करते चलो अर्थात् समेटने की शक्ति धारण करो। ।
30) कोई भी कार्य करते वा बात करते बीच-बीच में संकल्पों की ट्रैफिक को स्टॉप करो। एक मिनट के लिए भी मन के संकल्पों को, चाहे शरीर द्वारा चलते हुए कर्म को बीच में रोक कर भी यह प्रैक्टिस करो तब बिन्दू रूप की पावरफुल स्टेज पर स्थित हो सकेंगे। जैसे अव्यक्त स्थिति में रह कार्य करना सरल होता जा रहा है वैसे ही यह बिन्दुरुप की स्थिति भी सहज हो जाये।
31 ) याद को शक्तिशाली बनाने के लिए विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो, विस्तार में सार भूल न जाये । खाओ पियो, सेवा करो लेकिन न्यारेपन को नहीं भूलो। साधना अर्थात् शक्तिशाली याद । निरन्तर बाप के साथ दिल का सम्बन्ध । साधना इसको नहीं कहते कि सिर्फ योग में बैठ गये लेकिन जैसे शरीर से बैठते हो वैसे दिल, मन, बुद्धि एक बाप की तरफ बाप के साथ-साथ बैठ जाए। ऐसी एकाग्रता ही ज्वाला को प्रज्जवलित करेगी।
“दीदी मनमोहिनी जी के अव्यक्त होने के पश्चात दादी जी द्वारा दीदी जी की विशेषताओं का वर्णन
1) दीदी की शुभ भावनायें आज भी हमारे साथ हैं । यह आवाज हरेक के दिल से निकलता है क्योंकि दीदी ने स्वयं प्रति सर्व कामनायें समाप्त कर औरों के लिए शुभ कामनायें रखी । यादगार हृदय में छप जाता और शिक्षायें मस्तक पर छप जाती है। वो भूल नहीं सकती। दीदी की मीठी शिक्षायें आज भी सबको याद हैं और याद रहेंगी।
2) दीदी के लिए बाबा ने कहा - ईष्ट और अष्ट को कोई कष्ट नहीं हो सकता। रूप ऐसा है जो किसको दिखाई नहीं पड़ता। अगर दुःखधाम को सामने रखकर देखते तो दुःख की महसूसता होती है लेकिन राज़ों भरा राज़ गुप्त में था । भाग्यविधाता ने ऐसा पार्ट दिया है, इक्ट्ठे रहे हैं, इक्ट्ठे रहेंगे, दुःख की तो बात ही नहीं। यह मुहब्बत तो न मिटी है, न मिटेगी। रूहानी मुहब्बत जो कर्मातीत बनने में, एक दो को आगे बढ़ाने में दुआ का काम करती है। इस पार्ट को देखते और भी उमंग बढ़ता है कि अब हमें नम्बरवन में दीदी समान बनना है। समान बनने की प्रैक्टिस भी करनी है, और उनके समान हर संकल्प में सेवा की भावना, समीप लाने की भावना भी रखनी है।
3) दीदी जी कोई भी कारण का निवारण सेकण्ड में निकाल कर दे देती थी। सेवा करते भी पहले बाबा को आगे रखती थी। निचाई ऊंचाई भी बाबा देखे, आगे भी बाबा, पीछे भी बाबा, वह जो कराये, हमें क्या करना है। दो पुरों के बीच में। जैसे गेहूँ दो पुरों के बीच में आकर पीसे तो खाने लायक बनें। ऐसे ही आगे पीछे बाबा को रखने से आत्मा पीस जाती है यानी पवित्र बन जाती है, लायक बन जाती है, तभी आत्मा नई दुनिया के लिए योग्य बन सकती है।
4) सजनी वो जो साजन के साथ चले, जैसे चलाये वैसे चले। सखा, साजन का सम्बन्ध जुड़ाने के निमित्त हमारी दीदी बनी। उन्होंने ट्रेनिंग मुख से नहीं, लाइफ से दी । दीदी से हमें मर्यादा सम्पन्न सहज लाइफ मिली, उनकी शिक्षायें बहुत प्यारी लगती हैं। दीदी कहती थी टीचर को अपना फ्रैन्ड बना लो तो शिक्षायें सहज ही जीवन में आ जायेंगी, यह सहज युक्ति है।
5) तुम्हीं से खेलूं, तुम्हीं से खाऊं.. दीदी को इसी संस्कार ने बाप समान बना दिया । जैसे दीदी ने बाबा को मेरा बनाया, तो मेरा बनाने से बाबा के साथ-साथ सबको सकाश देने के निमित्त बन गई, ऐसे ही बाबा ना सिर्फ मेरा है, जो मेरा है वह सबका है।
6) दीदी को जन्म से ही सयानी कहते थे। सयाना वो जो जल्दी मोल्ड हो जाए। जो खुद इशारे से चले और इशारे से चलाये। कोई कोई होते जो बात को सीधा नहीं बोलते, बात को घुमा-फिराकर कहते हैं, वह सयाने हैं लेकिन उन्हें सयाना नहीं कहेंगे। हम ऐसे सयाने बने जो कुछ भी मिक्स न करें। सच्चाई और सफाई से सयाने बन जाएं।
7) मम्मा ने हमें धारणामूर्त बनाया और दीदी ने हमें पतिवृता बनाया। दीदी की दिल के अन्दर यही रहता कि इसका झुकाव और किसी आत्मा के प्रति न हो जाए। सदा एक बाबा प्रति ही रहे। भगवान के घर में कभी कोई झूठ न बोले । यही दीदी की आश रहती थी। साथ
8) दीदी जी जब हॉस्पिटल जा रही थी तो बाबा ने कहा, ' रहते, साथ बैठते साथ निभाया, साथी बनाया, तुम बाप के साथ हो, बाप तुम्हारे साथ है। साथ रहने का वायदा जन्मते ही किया। शरीर भल छूटे लेकिन यह साथी हमें छोड़ नहीं सकता। लौकिक में कोई भी ऐसा साथ दे नहीं सकता।
9) बाबा के हर कदम के पीछे अनेक गुह्य राज़ हैं और संगम का हर पल कल्याणकारी है। जैसे पहले हमने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि हमारा बाबा अव्यक्त होगा, लेकिन हमने ड्रामा की वह भी नई रंगत देखी। पहले शुरू में 14 वर्ष बाबा ने हम बच्चों से तपस्या करवाई फिर देश विदेश में बेहद की सेवा कराई। एक तपस्या जिससे रूद्र यज्ञ की स्थापना हुई, दूसरी तपस्या जिससे देश विदेश में सेवा का विस्तार हुआ।
10) बाबा ने दीदी को निमित्त बनाए आबू पहाड़ की चोटी पर बिठाया। इस आबू पर्वत पर रहते निमित्त बेगरी पार्ट बजाया, यज्ञ कुण्ड के अनेक कुण्ड बनाये, उसके बाद बाबा ने अपने अनेकानेक वारिस बच्चों को निकाला। कितने बच्चे तन-मन- धन से सहयोगी, निश्चयबुद्धि बने। भारत जो बाबा की जन्म भूमि है, उसमें पहले त्याग तपस्या और सेवा का कार्य चला। मम्मा बाबा ने भारत में कई स्थानों पर जाकर अनेक सेवायें की। अनेक वारिस बच्चे पैदा किये। फिर बाबा ने यह पाण्डव भवन बनाया। यहाँ से हर कार्य बाकायदे चला। यहाँ से बच्चों को चारों ओर सेवा का अनुभव कराने भेजा। अपनी 16000 की माला तैयार कराई। तो मैं एक ओर देखती - कहाँ बेगरी पार्ट, कहाँ अनेक वारिस बच्चे और कहाँ बेहद सेवा... फिर बाबा ने अव्यक्त बन अपना पार्ट बजाया, उसके पहले हमारी प्यारी माँ और भाऊ विश्वकिशोर को गुप्त रीति से हम बच्चों के बीच से उड़ा लिया, उनके जाने की भी बड़ी गुप्त कहानी है, आगे चल इसका भी राज़ खुलेगा । हम जानते हैं कोई बहुत बड़े विशेष पार्ट के लिए हमारे यज्ञ के वारिस गये हुए हैं।
11) यह भी कैसा स्वप्ना हुआ जो बाबा अव्यक्त हुआ, अव्यक्त होने के बाद विश्व सेवा का विस्तार हुआ । विश्व की अनेकानेक आत्माओं के दिलों में बाबा की छाप बैठी। बाबा जो कहता मैं सर्व आत्माओं का, सर्व धर्मो का भी ग्रेट ग्रेट ग्रैन्ड फादर हूँ, वह पार्ट अव्यक्त होने के बाद प्रत्यक्ष हुआ। अभी विदेशों में ऐसा पार्ट बज रहा है, जो देश तो देश है लेकिन विदेश देश से भी दुगुना आगे जा रहा है। बाबा ने ऐसी चाबी बनाई है जो बुद्धिवानों की बुद्धि बन सबकी बुद्धि को चेन्ज कर रहे हैं। दूर दूर से बच्चे आते, बाबा के दो शब्द सुनकर कितना खुश हो जाते, अव्यक्त में भी साकार का अनुभव कर जीवन के लिए बल भर जाते।
12 ) अव्यक्त होने के 14 वर्ष बाद बाबा ने जिस दीदी को निमित्त बनाया, उसे ही अपनी गोदी में नई रचना के लिए, योगबल की शुरूआत के लिए बुला लिया। दीदी को बाबा ने कैसे अपनी गोदी में छिपाकर बिठाया है, आज दीदी बेहद के तख्त पर बैठ विश्व में घूम रही है। दीदी बाबा के साथ अनेक सेवायें कर रही है।
13) बाबा हमेशा कहते - तुम शक्तियों का अन्त में विशेष पार्ट है, तो अब शक्तियों का पार्ट भी तो खुलना चाहिए । शक्तियों का पार्ट भी तब खुले जब कोई कमान्डर आगे जाए। तो यह भी दीदी का एक निमित्त पार्ट है। बाबा ने शक्ति रूपधारी हम सबकी प्यारी दीदी को निमित्त बनाया है, विशेष कोई पार्ट बजाने ।
14) अगर सोचें - तो आता दीदी चली गई। लेकिन फीलिंग आती मधुबन में दीदी सदा हाज़िर है। यह भी अनायास कोई न कोई कारण बनता जो बाबा हरेक को हिलाता है। दिखाई देता है जो भी आत्मायें चली गई हैं वह फिर से हाथ पकड़ेंगी ऐसी अनेक आत्माओं को नजदीक लाने का, उन्हें अंचली देने का यह भी दीदी का पार्ट है। यह प्रैक्टिकल रील चल रहा है। हमारी दीदी से अनेक आत्माओं का पुराना सम्बन्ध है, नाता है, वह फिर से आकर अपना वर्सा लेंगे। यह भी पर्दा खुलता जायेगा।
15) इस ड्रामा में यह 14-14 वर्ष का भी बड़ा खेल बना हुआ है। अब देखेंगे कि आगे 14 वर्ष में क्या होता है। कायदे अनुसार फिल्म का यह प्यारा रील चलता रहता है। कोई ऐसा कारण बनता है जो सबकी दिलों में आता कि अब घर जाना है। कल भी कहते आज भी कहते हैं कि घर जाना है, लेकिन अब यह दिल के अन्दर से आता, लहर आती कि अब हमें भी बाबा के वतन जाना है, कर्मातीत होना है ।
16) बाबा, बाप - टीचर - सतगुरू के साथ धर्मराज भी है। कई दीदी से भी डरते थे। क्यों? दीदी को हमारी भूल का पता ना चले। दीदी हमेशा कहती सच्चे दिल पर साहेब राज़ी । जरा भी बात होती तो दीदी ने कभी भी बाबा से नहीं छिपाई। दीदी सामने आती थी तो बाबा का चेहरा ही कुछ और हो जाता था। सच्चाई की शक्ति ऐसी हो जो परमात्मा से प्रेम खींच सके, मांगने से प्रेम नहीं मिलता और सब कुछ मिल सकता, ज्ञान भी सुन और सुना सकते पर प्रेम पाने के लिए सच्चाई चाहिए।
17) दीदी की खूबी, जो भी सामने आये उससे कौन सी सेवा लेनी चाहिए, ताकि उसका भाग्य बन जाए। कैसे ईश्वर से उसका स्नेह जोड़कर उनसे सेवा करायें ताकि उसका भाग्य बनता रहे। तो हमें भी उनसे यही प्रेरणा लेनी है।
18) ड्रामा के इस विचित्र पार्ट के अनुसार मीठी दीदी ने हम सबको यही लेसन दिया है कि अब सभी उपराम बनो। तो हम सबको अपनी इन अन्तिम श्वांसों में उपराम रहकर इस थोड़े से समय में हमें फुल मार्क्स लेनी हैं। जितनी जितनी हमारी वृत्ति उपराम रहेगी उतना व्यक्त भावों की वृत्ति खत्म होती जायेगी। कहा भी जाता - तुम्हें लेना क्या, देना क्या, तू साथ क्या ले जायेगा। हरेक जब जाता है तो अपने गुण ही छोड़ जाता, जिन गुणों का ही फिर सब गायन करते हैं।
19) आज दीदी के प्रति हरेक के दिल से प्यार का आवाज निकलता क्योंकि दीदी ने सबकी प्यार से सेवा की है, उस सेवा के कारण ही सबको दीदी की आकर्षण होती, सबके मुख पर दीदी है इसीलिए सब याद करते हैं, गुणगान करते हैं।
20) हरेक का दीदी के प्रति प्यार तो अटूट है, लेकिन उस प्यार का अब रिटर्न भी देना है। ऐसा रिटर्न दो जो कोई भी यह फील न करे कि दीदी चली गई या दीदी अबसेन्ट है। कई पूछते हैं - दीदी की जगह कौन? मैं कहती हरेक समझें हम सब दीदी के अंग हैं। हम सब दीदी की विशेषताओं को स्वयं में भर ले तो हम ही दीदी की जगह पर हैं। हम स्वयं दीदी का रूप बनें। तो यह प्रश्न ही खत्म हो जाता।
21) हम कोई वैरागी बाबा या हठयोगी बाबा नहीं हैं लेकिन हमारी स्थिति वानप्रस्थी उपराम चाहिए। उपराम वृत्ति से व्यक्त वायब्रेशन खत्म हो जाते हैं। हम योग के वायब्रेशन से ही अपने किले को पावरफुल बना सकते हैं। कम से कम 8 घण्टे योग का चार्ट जरूर बनाना है। हरेक को यह पुरुषार्थ करना है। कभी भी किसी के पुरुषार्थ को देख टोन्ट नहीं कसना है उसकी हंसी नहीं उड़ानी है। एक छोटी सी हंसी के आधार पर ही सारा महाभारत बना है इसलिए कभी भी टोन्ट नहीं मारो। टोन्ट भी दुःख देता है। हमारे किसी भी शब्द से किसी को दुख न हो। ऐसा कोई भी बोल न निकले जिससे नुकसान हो जाए।
मीठी दीदी मनमोहिनी जी 28 जुलाई 1983 को, अपनी भौतिक देह का त्याग कर अव्यक्त वतन वासी बनी । विशेष उनकी पुण्य स्मृति पर दीदी जी की अलौकिक पालना अथवा समय प्रति समय उनसे मिली हुई शिक्षाओं की स्मृतियां ताज़ी हो जाती हैं। दीदी जी का अलौकिक व्यक्तित्व, उनकी पालना जिन ब्रह्मा वत्सों ने ली है, उनके नयनों में दीदी जी की छवि सदा सामने रहती है, आज उनकी कुछ शिक्षायें आप सबके पास भेज रहे हैं, जिस पर क्लास में रूहरिहान करना जी
दीदी जी द्वारा सुनाई हुई मुख्य शिक्षायें और ईश्वरीय मर्यादायें
1) दूसरों का दोष निकालने के पहले हमें अपना दोष देखना है। कोई-कोई सेन्टर पर रहने वाली बहनें बहुत ज़ोर-ज़ोर से बोलती हैं, कई बार दिल को चुभने वाले कटुवचन भी मुख से निकालती, जिससे बहुत बड़ी डिससर्विस होती है। हर एक को अपने बोल पर बहुत ध्यान देना है। बाबा कहते बच्चे, कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो। यह गांठ हम सबको पहले स्वयं को बांधनी हैं।
2) छोटी बहिनों की ग्लानी कभी जिज्ञासुओं के सामने नहीं करो, अगर वह करें तो उनकी बातों में हाँ करके ठप्पा नहीं लगाओ।
3) टीचर्स जब कहीं सेन्टर पर जाकर सर्विस करती हैं, जिज्ञासु महिमा करते उस महिमा को स्वीकार कर लेती हैं, जिज्ञासु यहाँ आकर उस बहन की मांगनी करते हैं तो वह बहुत खुश होती हैं कि मैंने अच्छी सर्विस की है इसलिए मांगनी होती है। फिर सूक्ष्म अहंकार आ जाता है। रिजल्ट यह होती जो दो पार्टी हो जाती हैं, जिज्ञासु टूट जाते, इसका सारा कारण टीचर का है, इसमें डिससर्विस भरी हुई है।
4) कोई माता व भाई सर्विस पर जाना चाहते हैं लेकिन धन की कमी के कारण नहीं जा सकते तो उनको किराया देकर भेजना चाहिए, यह सबको डायरेक्शन है।
5) ट्रायल के लिए वही कुमारी आये जो 12 मास सेन्टर पर रेग्युलर क्लास करती हो। उसे माँ बाप लिखकर दें कि इसे समर्पित करते हैं। वह कुमारी भी लिखे कि मैं समर्पित होना चाहती हूँ। पहले मधुबन में एक मास की ट्रेनिंग लेवे फिर कोई सेन्टर पर ट्रायल पर भेजें। जब कन्या ट्रायल पर है तब उसके माँ बाप जो कुछ भी भेजना चाहें वह मधुबन भेजें, सेन्टर पर नहीं। कुमारी समर्पण मधुबन की है।
6) जो माया के वश हो बाबा के बच्चे बन माया की मत पर शादी करते हैं, उन्हें 1 साल तो क्लास के संगठन में आने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। मुरली की मांगनी करते हैं तो उन्हें भेज सकते हैं। अगर सेन्टर पर आने की जिद्द करते हैं तो अलग से टाइम देना चाहिए, ताकि उन्हें संग का बल मिलता रहे।
7) जो भी जिज्ञासु आए उनसे फार्म जरूर भरायें, इस बात में ढीला नहीं होना चाहिए ।
8) अमृतवेले क्लास सेन्टर की इन्चार्ज को ही करानी है, क्लास में नवीनता होनी चाहिए।
9) डायरेक्शन जो मधुबन से आयें उस पर पूरा ध्यान देना है, नहीं तो बहुत ही कारोबार में दिक्कत होती है।
10) टीचर्स को खरीददारी करने मार्केट में बिल्कुल नहीं जाना चाहिए। अभी तक यह रिपोर्ट आती है कि वही भाषण करती, वही दुकानों पर जाकर खरीददारी करती। कई तो भाईयों के साथ स्कूटर पर बैठकर जाती, यह ईश्वरीय मर्यादा का उल्लघंन हैं। कृपया इन मर्यादाओं का कंगन बांधकर रहें।
11) सावधानी देने वाला हमारा बाबा है, हमें किसी को शिक्षा के रूप में कुछ नहीं कहना है, मुरली में शिक्षा के महावाक्यों को अपनी तरफ से बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बोलना चाहिए। कोई भी बात हो राय दे सकते हैं। शिक्षा का रूप नहीं हो। मुरली में कुछ कट भी नहीं करना चाहिए।
12) कुमारियों के समर्पण पत्र ज़ोन इन्चार्ज के पास होने चाहिए। ज़ोन इन्चार्ज को तीन मास या दो मास के बाद ज़ोन की सब टीचर्स को बुलाकर दिल लेनी चाहिए। ज़ोन में कोई सेन्टर में कमी है तो ज़ोन इन्चार्ज पूरी रेख देख करे, कमी पूरी करे ।
13) हर क्लास में एक हेड भाई होना चाहिए, उसे सर्विस का जिम्मेवार बनाना चाहिए। हर 15 दिन में सर्विस की मीटिंग करनी चाहिए ताकि सर्विस ठण्डी न हो।
14) गीता पाठशाला की माताओं को ट्रेनिंग देना बहुत जरूरी है, जिसके घर में क्लास होता है उसका जीवन आदर्श होना चाहिए ताकि आने वालों पर प्रभाव पड़े। कहीं अमर्यादा का कार्य उनके घर में होते देख डिससर्विस न हो ।
15) बाबा कहते बच्चे, यज्ञ में आने वालों पर अधिक बोझ नहीं चढ़ाओ, यह गुह्य राज़ तो सब समझते हैं इसलिए सौगात को भी हल्का किया गया है। डायरी पेन आदि...
16) रास्ते में मुसाफिरी में ज्यादा खाने पीने का सामान ले जाते जैसेकि पिकनिक पर जाते हैं इससे और ही डिससर्विस होती है, यह बात भी विशेष ध्यान पर रखनी चाहिए।
17) पहली सीढ़ी देह सहित देह के सम्बन्धियों से उपराम । लेकिन अभी तक तो इस सीढ़ी पर चढ़े ही नहीं हैं। कारण पूरी दिल अपने साथ रहने वाली बहिनों की भर दें तो सम्बन्धियों में बुद्धि न जाये। यह भी बड़ों की जिम्मेवारी है।
18) बाबा ने सम्पन्न बनाने लिए हम बच्चों को श्रीमत दी है। श्रीमत पर चलने का आधार है - एक बल एक भरोसा । यह श्रीमत की नींव है। बाबा के हर इशारे को हम एक्ट में तभी ला सकेंगे जब पूरा फेथ होगा। जिसमें फेथ होता है, उसकी राय में कभी अपनी राय मिक्स नहीं हो सकती। एक बाबा की राय पर चलने से हल्के रहेंगे। बाबा ने कहा है जिम्मेवारी बाबा को दे दो और खुद हल्के रहो। अगर किसी के मन में यह संकल्प चलता है कि बाबा तो अब साकार में नहीं है तो यह भी संशय है । अमृतवेले विधिपूर्वक योग में बैठते हैं तो अनुभव करते हैं कि बाबा लेन-देन कर रहे हैं। स्व-स्मृति में रहेंगे तो बाबा को जो अपना कार्य कराना है, कराते रहेंगे। कराते हैं, ऐसा अनुभव करेंगे।
19) जैसे श्वांस के बाद श्वांस उठता है, वैसे संकल्प के बाद संकल्प उठता है, दोनों की रेस है। कर्म में श्वांस जल्दी चलते, योग में संकल्प जल्दी चलते। योग में एक बाप की याद के प्यार के संकल्प में एकाग्र हो जाएं तो सब रस प्राप्त होते हैं। एकाग्रवृत्ति की धरनी पर हर संकल्प फलदायक होता है। इसके लिए कर्मयोग का अभ्यास चाहिए। दिनचर्या पर अटेन्शन हो। न्यारे और प्यारे की स्थिति बहुत मीठी अवस्था है।
20) सदा अपने स्वमान में स्थित रहो तो फरिश्ते पन की स्टेज दूर नहीं। कभी-कभी अगर कमजोरी के संकल्प उठते हैं तो कहेंगे स्वमान की स्टेज से नीचे आ गये। महारथी की मुख्य निशानी है फालो फादर । और हर कदम श्रीमत पर। तो जो स्वरूप बाबा हमारे से चाहते हैं, वह अभी प्रत्यक्ष होना चाहिए। सदैव याद रहे जैसा कर्म हम करेंगे... हमें बाबा के 8 दिल तख्तनशीन बनना है। अगर दिल कहाँ टुकड़ा टुकड़ा होगी तो बाबा स्वीकार नहीं करेंगे।
21) बाबा की दिल और मेरी दिल में अन्तर न हो। कोई कितना भी गुणवान हो, हमें उस पर न्योछावर नहीं जाना है। देखना है इसको ऐसा गुणवान बनाया किसने? तो बुद्धि डायरेक्ट उस तरफ (बाप की तरफ) चली जायेगी। जब बाबा की दिल से दिल मिल गई तो और कहाँ जा नहीं सकती। इसमें गुण हैं इसके लिए इनसे हमारा स्नेह है, यह भी बहुत सूक्ष्म माया है। बाबा हमें अभी इससे भी पार लिये जा रहे हैं । जब दिलवर को दिल दे दी तो हमारा फरिश्ता स्वरूप दूर नहीं । ईश्वरीय परिवार में भी बुद्धि नहीं फंसानी है। हमारा संसार, हमारा परिवार एक ही है - हमारा तो एक बाप दूसरा न कोई । यह भी महारथियों की निशानी है। इससे ही किला मजबूत होगा ।
22) जो हम सबको पहले दिन सुनाते हैं कि तुम्हें चार नियमों का पालन करना है - 1- ब्रह्मचर्य 2 - सतसंग 3- शुद्ध अन्न और 4- दैवीगुण। तो हम अपने में चेक करें कि कहाँ तक इन नियमों का पूर्ण रूप से पालन किया है! कर्मणा में तो नहीं आते लेकिन मन्सा में भी संकल्प न आये । सदैव संगदोष से बचे रहें। सदैव एक बात याद रहे कि एक की सुननी है, एक को ही दिल में बसाना है।
23) योग द्वारा हमारे विकर्म विनाश होते हैं उसकी निशानियां - उसकी नेचर ही बदल जायेगी। 2- बुद्धि की लाइन क्लीयर हो जायेगी। 3- बोझ से हल्के रहेंगे। उनके मुख से कभी यह नहीं निकलेगा कि यह मेरे आगे कोई परीक्षा आई है। 4- चढ़ती कला होगी, जिससे उसे फीलिंग आयेगी कि ये मेरे विकर्म विनाश होते हैं । 5- मेहनत कम सफलता ज्यादा का अनुभव होगा।
24) ‘“अब घर चलना है" यह याद रहे तो आटोमेटिक सब तरफ से दिल हल्की हो जाती है, कोई परवाह नहीं। खाते- पीते-उठते... घर चलना है। इससे बाप याद रहेगा, पुरानी दुनिया से किनारा हो जायेगा। फिर तेरा, मेरा, इसने किया, उसने किया... यह शब्द भी मुख से नहीं निकलेंगे। यह भी महारथी की निशानी है।
25) अगर कोई कहे तुम्हारे में यह कमजोरी है तो उसे फौरन मानना चाहिए। बैठकर जिद्द करना, शो करना, यह हमारे ब्राह्मण परिवार का नियम नहीं है ।
सूचना:- मई एवं जून मास में विशेष तपस्या करने के लिए आपके पास 15-15 दिन की विशेष प्वाइन्ट भेजी गई हैं। इस जुलाई मास में सभी स्थानों पर योग तपस्या के कार्यक्रम रखने के लक्ष्य से ज्वाला स्वरूप याद की प्वाइन्टस् मुरली के नीचे अव्यक्त इशारे के रूप में लिखी गई हैं । वही प्वाइन्टस् जुलाई मास के पत्र - पुष्प में भी भेज रहे हैं। अलग से होमवर्क नहीं आयेगा । ओम शान्ति ।