मार्च 2026
पत्र-पुष्प
परमपिता मधुबन बिन्दु स्वरूप
"निश्चय बुद्धि बन सदा निश्चित स्थिति में रहो तो सफलता स्वतः मिलेगा"
(निमित्त टीचर्स तथा सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई-बहनों प्रति शुभ प्रेरणायें)
20-02-2026
प्राणप्यारे अव्यक्त मूर्त मात-पिता बापदादा के अति लाडले, सदा निश्चयबुद्धि
निश्चित स्थिति में रहने वाले, हर कदम श्रीमत प्रमाण उठाने वाले, निमित्त टीचर्स
बहिनें तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न
मधुर याद स्वीकार करना जी।
बाद समाचार - त्रिमूर्ति शिवजयन्ती का पावन पर्व सभी ने खूब उमंग-उत्साह से मनाया,
सब तरफ से बहुत अच्छे अच्छे समाचार मिल रहे हैं। मधुबन में भी सभी स्थानों पर
शिवबाबा का ध्वज फहराते सबने एक दो को बधाईयां दी, खूब खुशियां मनाई। प्यारे बापदादा
ने भी अपने महावाक्यों में सबको बधाई देते हुए होमवर्क दिया कि बच्चे अब विशेष
व्यर्थ संकल्पों के वा अपनी कमी कमजोरियों के अक के फूल बाबा पर अर्पित करो। तो उसी
प्रमाण अटेन्शन रख संगम के अमूल्य समय और संकल्पों को सफल कर रहे होंगे। अभी मार्च
महीने में होली का पावन पर्व है, यह भी बीती सो बीती कर, आपस में मंगल मिलन मनाने
तथा सम्पूर्ण पावन बनने की प्रतिज्ञा का बहुत सुन्दर यादगार पर्व है। तो सभी को इस
विशेष पर्व की बहुत-बहुत हार्दिक बधाई हो।
देखो, हर मास एक नये विषय पर प्यारे बापदादा के अव्यक्ति इशारे सबके पास भेजे जा रहे
हैं। डबल विदेशी भाई बहिनें भी अव्यक्ति परिवार में जुड़कर इसका बहुत अच्छा लाभ ले
रहे हैं। इस मास के लिए प्यारे बापदादा का विशेष इशारा है कि बच्चे "निश्चय बुद्धि
बन सदा निश्चित स्थिति का अनुभव करो", जब निश्चित स्थिति में रहकर कोई भी कार्य
करेंगे तो वह सफल जरूर होगा क्योंकि निश्चित स्थिति में रहने से बुद्धि यथार्थ
निर्णय करती है, फिर निश्चय रहता कि हमारी विजय तो हुई ही पड़ी है। वे कभी क्यों,
क्या के प्रश्नों में उलझते नहीं। निश्चयबुद्धि बच्चे सभी चिन्ताओं से परे रहने
कारण सदा बेफिक्र बादशाह रहते हैं। उन्हें विश्वास रहता कि हम ईश्वरीय खजानों के
मालिक और परमात्मा के बालक हैं। यह ईश्वरीय खजाने इस जन्म में तो क्या लेकिन अनेक
जन्म साथ हैं और साथ रहेंगे।
वर्तमान तमोगुणी वातावरण में अनेक प्रकार की समस्यायें आना तो स्वाभाविक है ही
लेकिन निश्चय बुद्धि, त्रिकालदर्शी बच्चों का काम है समाधान स्वरूप बन उन समस्याओं
को परिवर्तन करना। समस्यायें ही माया का स्वरूप हैं, जब माया को चैलेन्ज किया है तो
वह सामना तो करेगी लेकिन आप अपने निश्चयबुद्धि विजयी स्वरूप से, नथिंगन्यु समझकर
पार कर लो तो बेफिक्र बादशाह रहेंगे। बोलो, मीठे भाई बहिनें ऐसे प्यारे ब्रह्मा बाबा
के समान बेफिक्र बादशाह की स्थिति का अनुभव करते हो ना! अभी बाबा अपने बच्चों को ऐसा
बेफिक्र देखना चाहते हैं।
बाकी मधुबन वरदान भूमि में सदा ही बाबा के बच्चों की रिमझिम है। अभी चारों तरफ से
सेवाओं के निमित्त बने हुए डबल विदेशी भाई बहिनें मधुबन पहुंच रहे हैं। हम और जयन्ती
बहन तथा विदेश की सभी निमित्त बड़ी बहिनें व भाई मधुबन में पहुंच गये हैं। हर एक के
दिल में बाबा को प्रत्यक्ष करने का उमंग सदा ही रहता है तो सब मिलकर पूरे वर्ष के
लिए स्व-उन्नति और सेवा के प्लैन बनायेंगे, साथ-साथ योग तपस्या भी करेंगे।
अच्छा - सभी को बहुत-बहुत याद...। ईश्वरीय सेवा में, बी के मोहिनी मुख्य प्रशासिका,
ब्रह्माकुमारीज़
ये अव्यक्त इशारे
निश्चय के फाउण्डेशन को मजबूत कर सदा निर्भय और निश्चिंत रहो
1. जब कोई बड़े के हाथ में हाथ होता है तो छोटे की स्थिति। बेफिक्र, निश्चित रहती
है। आपको निश्चय है कि हर कर्म में बापदादा मेरे साथ भी है और हमारे इस अलौकिक जीवन
का हाथ उनके हाथ में है अर्थात् जीवन उनके हवाले है तो ज़िम्मेवारी उनकी हो जाती
है। सभी बोझ बाप के ऊपर रख अपने को हल्का कर दो तो सदा निश्चित रहेंगे और हर कार्य
एक्यूरेट होगा।
2. जो निश्चयबुद्धि होगा वह निश्चित होगा, उसे किसी भी प्रकार का चिन्तन वा चिन्ता
नहीं होगी। क्या हुआ? क्यों हुआ? ऐसे नहीं होता तो अच्छा होता, यह भी व्यर्थ चिंतन
है। निश्चयबुद्धि निश्चित वह कभी व्यर्थ चिन्तन नहीं करेगा। सदा स्वचिन्तन में रहने
वाला, स्वस्थिति से परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर लेता है।
3. विजयी बनने का फाउन्डेशन है "निश्चय , फाउन्डेशन अगर पक्का है तो बिल्डिग हिल नहीं
सकती, निश्चित रहते हैं। अगर फाउन्डेशन कच्चा है तो थोड़ा-सा भी तूफान आयेगा, थोड़ी
भी धरनी हिलेगी तो भय होगा कि यह बिल्डिंग हमारी गिर नहीं जाए या क्रेक (दरार) नहीं
हो जाए। लेकिन निश्चय का फाउन्डेशन पक्का होगा तो निर्भय और निश्चित रहेंगे।
4. निश्चय सदा ही निश्चित बनाता है और जो निश्चित स्थिति में रहकर कोई भी कार्य करता
है वह उसमें सफल जरूर होता है क्योंकि निश्चित स्थिति में बुद्धि यथार्थ जजमेंट करती
है। यथार्थ निर्णय का आधार है - निश्चय बुद्धि, निश्चित स्थिति, उसमें सोचने की भी
आवश्यकता नहीं है।
5. श्रीमत प्रमाण हर कदम हो तो सदा निश्चित रहेंगे और निश्चित हैं तो सदा यथार्थ
निर्णय देंगे। जब निर्णय यथार्थ होगा तो विजयी होंगे। त्रिकालदर्शी आत्मा सदा ही
निश्चित रहती है क्योंकि उसे निश्चय है कि हमारी विजय हुई ही पड़ी है।
6. निश्चय बुद्धि बच्चे सदा हर्षित और निश्चित रहते हैं। चिन्ता खुशी को खत्म करती
है और निश्चिन्त हैं तो सदा खुशी रहेगी, जब किसी भी बात में क्यों हुआ, कैसे हुआ,
क्या होगा!... यह प्रश्न आते हैं तब चिंता होती है। क्या, क्यों, कैसे - ये चिन्ता
की लहर है। कई फिर कहते हैं कि मेरे से ही क्यों होता है? मेरे पीछे ये बंधन क्यों
है! मेरे पीछे माया क्यों आती है! मेरा ही हिसाब- किताब कड़ा है, क्यों? तो 'क्यों'
आना माना चिन्ता की लहर। जो इन चिन्ताओं से परे है वही निश्चित है।
7. निश्चयबुद्धि का अर्थ है बेफ़िक्र बादशाह, वही बाप समान है। विनाशी धन वाले जितना
कमाते उतना समय प्रमाण फिक्र में रहते। लेकिन जिन्हें फेथ है कि हम ईश्वरीय खजानों
के मालिक और परमात्म बालक हैं वह सदा ही स्वप्न में भी बेफिक्र बादशाह हैं, क्योंकि
उनको विश्वास है कि यह ईश्वरीय खजाने इस जन्म में तो क्या लेकिन अनेक जन्म साथ हैं,
साथ रहेंगे इसीलिए वह निश्चयबुद्धि, निश्चित रहते हैं।
8. समस्याओं का काम है आना, निश्चयबुद्धि आत्मा का काम है समाधान स्वरूप से समस्या
को परिवर्तन करना। क्यों? आप हर ब्राह्मण आत्मा ने ब्राह्मण जन्म लेते ही माया को
चैलेन्ज किया है कि हम मायाजीत बनने वाले हैं। तो समस्या का स्वरूप माया का स्वरूप
है। जब चैलेन्ज किया है तो माया सामना तो करेगी लेकिन आप उसे निश्चयबुद्धि विजयी
स्वरूप से, नथिगन्यु समझकर पार कर लो तो बेफिकर बादशाह रहेंगे।
9. आपको जो भी ड्यूटी मिली हुई है, उसमें सदा एक्यूरेट रहो, जो ड्यूटी पर एक्यूरेट
रहता है उसको सभी ईमानदार वा फेथफुल की नज़र से देखते हैं। यहाँ भी जो एक्यूरेट सेवा
पर रहते हैं वही बाप के फेथफुल हैं। एक होता है बाप में पूरा फेथ, दूसरा है बाप के
साथ सेवा में भी फेथफुल। ऐसे फेथफुल निश्चयबुद्धि बच्चे सदा विजयी और निश्चित रहते
हैं।
10. जैसे ज्ञान की सब्जेक्ट है, वैसे सेवा की भी सब्जेक्ट है, जो इसमें फेथफुल
निश्चयबुद्धि है वही नम्बर आगे जा सकता है। सुबह से रात तक अपना फिक्स प्रोग्राम,
डेली डायरी बनाओ, क्योंकि जिम्मेवार आत्मायें हो, रिवाजी आत्मायें नहीं, विश्व
कल्याणकारी आत्मायें हो। तो जो जितना बड़ा आदमी होता है, उसकी दिनचर्या सेट होती
है।
11. फेथफुल की पहली निशानी है हर सेकण्ड हर कदम श्रीमत पर एक्यूरेट चलना। एक्यूरेट
मूर्ति बनना अर्थात् हेमर लगना। हेमर से ही तो उसे ठोक ठोक करके ठीक करते हैं। आप
लोग तो हेमर खाने के अनुभवी हो गये हो, नथिग न्यु। खेल लगता है ना। देखते रहते हो
और मुस्कराते रहते हो, दुआयें देते रहते हो। हीरो एक्टर अर्थात् एक्यूरेट पार्ट
बजाने वाले, निश्चयबुद्धि निश्चित आत्मा।
12. कैसी भी कड़ी परिस्थिति हो लेकिन खेल समझने से कड़ी समस्या भी हल्की बन जाती
है। कई बच्चों में हिम्मत है इसलिए कार्य करो तो फिर विजय ही विजय है। विजय के आगे
समस्या कोई भी बात होती है तो कहते हैं हां करेंगे, सोचेंगे। हिम्मत तो है, लेकिन
फेथ नहीं है। फेथफुल के बोल ऐसे नहीं होते। फेथफुल का अर्थ ही है - मन, वचन, कर्म
हर बात में निश्चयबुद्धि, उनके मुख से कभी हिम्मतहीन बनाने वाले शब्द नहीं निकल सकते।
13. सबसे पहले स्वयं में पूरा फेथ (विश्वास) चाहिए फिर बाप- दादा और सर्व परिवार की
आत्माओं में फेथफुल होना पड़ता है। जितना फेथफुल बनकर निश्चयबुद्धि होकर कोई
कर्तव्य करेंगे तो फेथफुल होने से सक्सेसफुल हो ही जायेंगे। फेथफुल होने से हर
कर्तव्य, हर संकल्प, हर बोल पावरफुल होगा।
14. विजयी बनने का फाउन्डेशन है "निश्चय", फाउन्डेशन अगर पक्का है तो बिल्डिंग हिल
नहीं सकती, निश्चित रहते हैं। लेकिन सिर्फ बाप में निश्चय नहीं, अपने आपमें भी
निश्चय और ड्रामा में भी निश्चय। वाह ड्रामा वाह! अगर ड्रामा में निश्चय होगा तो
अकल्याण की बात भी कल्याण में बदल जायेगी।
15. जैसे पहरे वाला चौकीदार अगर शस्त्रधारी होता है और उसको निश्चय है कि मेरा
शस्त्र दुश्मन को भगाने वाला है, हार खिलाने वाला है तो वह कितना निर्भय हो करके
चलता रहता है। तो आप के पास भी सर्व शक्तियों रूपी शस्त्र सदा साथ हैं, सिर्फ
आवाह्न करो अर्थात् मालिक बन आर्डर करो तो सफलता सदा हुई पड़ी है।
16. यदि निश्चय रूपी फाउण्डेशन पक्का है तो सहज योगी, निर्मल स्वभाव, शुभ भावना की
वृत्ति और आत्मिक दृष्टि वाले होंगे। चलन और चेहरे से हर समय सरलता की झलक अनुभव
होती रहेगी। तो हरेक की विशेषता को स्मृति में रख एक दो में फेथफुल रहो तो उनकी बातों
का भाव बदल जायेगा।
17. जैसे आपस में दो मित्र होते हैं तो उनके बीच यदि कोई उनकी ग्लानि करने आता है
तो वह उसके भाव को बदल देते हैं। जहाँ निश्चय होता है वहाँ शब्द का भाव बदल साधारण
बात हो जाती है। तो हरेक की विशेषता को देखो तब अनेक होते भी एक दिखाई देंगे। एकमत
संगठन हो जायेगा। कोई किसके ग्लानि की बातें सुनाये तो उसे टेका देने के बजाए सुनाने
वाले का रूप परिवर्तन कर दो।
18. जो जितना निश्चयबुद्धि होगा उतना ही सभी बातों में विजयी होगा। निश्चयबुद्धि की
कभी हार नहीं होती। हार होती है तो समझना चाहिए कि निश्चय की कमी है। निश्चयबुद्धि
विजयी रत्नों में से हम एक रत्न हैं, ऐसे अपने को समझना है। कोई भी विघ्न आए तो उनको
पेपर समझ पास करना है। बात को नहीं देखना है लेकिन पेपर समझ पास होना है।
19. बाप में तो निश्चय है लेकिन अपने में भी निश्चयबुद्धि होकर कोई चीज़ नहीं है।
फिर वह समस्या नहीं फील होगी लेकिन खेल फील होगा। खेल खुशी से किया जाता है। कोई
कार्य सहज होता है तो कहा जाता यह तो बायें हाथ का खेल है अर्थात् सहज है। तो यह भी
बुद्धि का खेल हो जायेगा। खेल में घबरायेंगे नहीं।
20. कर्म करने के पहले यह निश्चय रखो कि विजय तो हमारी हुई पड़ी है। अनेक कल्प विजयी
बने हैं। जब अनेक कल्प, अनेक बार विजयी बन विजय माला में पिरोने वाले, पूजन होने
वाले बने हैं तो अब वही रिपीट करना है। बना हुआ कर्म दुबारा रिपीट करना है इसलिए कहा
जाता है कि बना बनाया....। बना हुआ है लेकिन अब फिर से रिपीट कर 'बना बनाया' जो
कहावत है उसको पूरा करना है।
21. व्यर्थ संकल्प वा संशय की मार्जिन होते हुए भी समर्थ संकल्प चलें कि सदा बाप
रक्षक है, कल्याणकारी है। इस निश्चय की विजय अवश्य होती है। तो क्वेश्चन मार्क का
टेढ़ा रास्ता न ले सदा कल्याण की बिन्दी लगाओ। फुलस्टॉप। इसी विधि से हर बात सहज भी
होगी और सिद्धि भी प्राप्त होगी।
22. यह निश्चय व स्मृति और समर्थी रखो कि अनेक बार बाप के बने हैं व मायाजीत बने
हैं, तो अब बनना क्या मुश्किल है! क्या यह स्मृति स्पष्ट नहीं है कि मुझ श्रेष्ठ
आत्मा ने विजयी बनने का पार्ट अनेक बार बजाया है? अगर स्मृति स्पष्ट नहीं है तो इससे
सिद्ध है कि बाप के आगे स्वयं को स्पष्ट नहीं किया है।
23. सरकमस्टांस भले कैसे भी हों लेकिन निश्चयबुद्धि बच्चे सरकमस्टांस में अपनी
स्वस्थिति की शक्ति से सदा विजयी अनुभव करेंगे। चाहे दुनिया वाले लोग वा ब्राह्मण
परिवार के सम्बन्ध- सम्पर्क में दूसरा समझे वा कहे कि यह हार गया लेकिन वह हार नहीं
है, जीत है। कोई भी सेवा की, संगठन की, प्रकृति की परिस्थिति स्वस्थिति को वा
श्रेष्ठ स्थिति को डगमग करती है तो यह भी बन्धनमुक्त स्थिति नहीं है। इस बन्धन से
भी मुक्त बनो।
24. साकार में अगर कोई निमित्त श्रेष्ठ आत्मा साथ में होती है तो उनसे कोई भी बात
वेरीफाय कराए फिर करेंगे तो निश्चयबुद्धि होकर करेंगे। निर्भयता और निश्चय दोनों
गुणों को सामने रख करेंगे। तो जहाँ सदा निश्चय और निर्भयता है वहाँ सदैव श्रेष्ठ
संकल्प की विजय है। जो भी संकल्प करते हो, अगर सदा निराकार और साकार साथ वा सम्मुख
है, तो वेरीफाय कराने के बाद निश्चय और निर्भयता से करो, इससे समय भी वेस्ट नहीं
जायेगा।
25. जैसे डाक्टर पेशेन्ट को पहले फेथ में लाते हैं, उन्हें विश्वास हो जाता है कि
यह डाक्टर बड़ा अच्छा है, यहाँ से शफा मिल जायेगी। वैसे डाक्टर कितनी भी बढ़िया
दवाई दे लेकिन अगर फेथ नहीं है तो उस दवाई का असर नहीं होता। ऐसे रुहानी डाक्टरी
में भी ऐसी शक्तिशाली स्टेज हो जो सबका फेथ हो जाए कि यहाँ पहुंचे हैं तो अवश्य कोई
न कोई प्राप्ति होगी ही।
26. जैसे कार में बैटरी जब थोड़ा ढीली हो जाती है, कार अपने आप नहीं चलती है तो
दूसरों से थोड़ा धक्का लगवाते हैं, ऐसे जिस भी आत्मा में आपका फेथ हो और समझो इनसे
हमको मदद मिल सकती है तो उनसे थोड़ा-सा सहयोग लेकर आगे बढ़ जाना चाहिए। कमजोरी की
बात को ज्यादा नहीं सोचना तब खुशी में आगे बढ़ते जायेंगे।
27. बाप सर्वशक्तिवान है तो उसका हाथ पकड़ने वाले पहुँचे कि पहुँचे - यह फेथ रखो।
चाहे खुद भले कमजोर भी हो लेकिन साथी तो मजबूत है ना! इसलिए पार हो ही जायेंगे। सदा
ऐसे निश्चयबुद्धि विजयी रत्न हैं, इसी स्मृति में रहो। बीती सो बीती, बिन्दी लगाकर
आगे बढ़ो।
28. बाप का बच्चों में पूरा फेथ है कि यही मेरे बच्चे विघ्न- विनाशक आत्मायें हैं,
पूज्य आत्मायें हैं, यह बच्चे बाप से भी आगे हैं। निमित्त बने हुए सदा बाप को भी
निश्चिन्त करने वाले हैं, सदा खुशखबरी सुनाने वाले हर एक विशेष हैं। स्वयं में भी
ऐसा फेथ रख इसी स्मृति स्वरूप में रहो तो विजयी बन जायेंगे।
29. आपस में एक दो के प्रति सच्चा स्नेह हो, तो स्नेही आत्मा के प्रति कभी अनुमान
पैदा नहीं होगा। उनके स्नेह के बोल, साधारण होते भी फील नहीं होंगे। उनका हल्का बोल
भी ऐसे लगेगा कि इसने अवश्य कोई मतलब से कहा होगा। बेमतलब, व्यर्थ नहीं लगेगा। जहाँ
स्नेह होता है, वहाँ फेथ जरूर होता है। तो ब्राह्मण परिवार में एक दो के प्रति इतना
स्नेह वा फेथ रख सम्पूर्ण निश्चयबुद्धि बनो तब ब्रह्मा बाप की आशाओं को पूरा कर
सकेंगे।
30. कई बच्चे समझते हैं मैं स्वयं को जानता हूँ कि मैं ठीक हूँ, दूसरे नहीं जानते व
दूसरे नहीं पहचानते, आखिर पहचान ही लेंगे व आगे चलकर देखना क्या होता है! यह भी
ज्ञान स्वरुप, याद स्वरूप आत्मा के लिए स्वयं को धोखा देने वाली अलबेलेपन की मीठी
निद्रा है। जिनके निश्चय का फाउन्डेशन मजबूत है वह कभी छिप नहीं सकते, वे सदा
निर्भय और निश्चित रहते हैं।
31. जिस समय कोई भी परिस्थिति आये तो बाप को साथी बना लो तो अनुभव करेंगे कि मैं
अकेला नहीं हूँ, मेरे साथ विशेष शक्ति है। जहाँ बाप है वहाँ चाहे कितने भी तूफान
हों, वह तोहफा बन जायेंगे। निश्चय बुद्धि विजयन्ति इस टाइटिल की स्मृति से विजयी बनो
और विजयी वर्ष मनाओ।
(त्रिमूर्ति दादियों द्वारा मिली हुई अनमोल शिक्षायें)
शिवबाबा याद है? गुल्जार दादी जी के पुण्य स्मृति
दिवस पर
विशेष साधना और योग की गुह्यतम परिभाषा
1. हम सबकी साधना वा योग क्या है? एक बाबा को अपना संसार बना लेना, उनके साथ अपने
सर्व सम्बन्ध जोड़ना, यही हमारी सच्ची साधना है क्योंकि जितना सम्बन्ध समीप का होता
है उतना उसकी याद स्वतः रहती है। हमारा बाबा सर्व संबंध निभाने वाला है, बाबा से हमें
अनेकानेक प्राप्तियां हुई हैं, उन सबका अनुभव है। तो साधना अर्थात् एक बाबा की याद
और उस साधना में एकाग्रता।
2. भक्ति मार्ग में भगत लोग भिन्न-भिन्न रूप से साधना करते हैं। जब तक वो अपने
लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते, दर्शन नहीं हो जाते तब तक एक टांग पर ही खड़े
रहेंगे वा हठयोग की साधना करते रहेंगे। यहाँ तो ऐसे हठयोग की, एक टांग पर खड़े होने
की बात नहीं है, हम तो अपने मन-बुद्धि को एक में लगाते हैं - यही हमारी साधना है।
3. साधना शब्द का अर्थ है एकाग्रता, उसमें जरा भी हलचल न हो। जहाँ एकाग्रता होती है
वहाँ जिस स्थिति का अनुभव करना चाहते हैं, वह चाहना एकाग्रता के बल से पूर्ण हो जाती
है। जैसे परमधाम में हम मन बुद्धि द्वारा एक सेकेण्ड में पहुँच तो जाते हैं परन्तु
उसमें सदैव एकाग्रता हो अर्थात् एकरस अवस्था हो और हमेशा उसी का अनुभव होता रहे।
समझो, अभी आत्मा अशरीरी बनके परमधाम में बाबा के साथ पहुँच गई, स्थिति वह हो गई फिर
कोई भी व्यर्थ संकल्प या कोई काम का संकल्प भी न आये, कोई भी हलचल आकर्षित न करे,
यही है सच्ची साधना। अगर एकाग्रता हिल जाती है, तो वह साधना नहीं है। साधना का अर्थ
ही है एक ही स्थिति में एकाग्र होकर, जितना समय चाहें उतना समय हम उस स्थिति में
स्थित हो जाएं। साधना तो हम सब करते हैं और साधना चलते-फिरते भी हो सकती है लेकिन
साधन के वश न हो, स्थिति कमल पुष्प समान हो।
4. एक होता है पुरूषार्थ करना जैसे हमने याद किया बाबा, मैं अशरीरी आत्मा हूँ। बाबा
जैसे आप हो वैसे मैं भी आत्मा ज्योति हूँ, मैं भी परमधाम निवासी हूँ, अपने घर में
बाबा आपसे मिलने आ रही हूँ... संकल्प से ऐसा पुरूषार्थ करते हैं लेकिन जब साधना की
स्थिति होती है तो उसमें पुरूषार्थ खत्म हो जाता है और उसी स्थिति में स्थित हो जाते
हैं। हिलते-डुलते नहीं हैं और जितना समय हम चाहें उतना समय हम बाबा की याद में खो
जाएं। ऐसी पावरफुल साधना हो जो हम अपने मन को एकाग्र करके उसमें टिक सकें।
5. कभी-कभी हमारी रूची होती है सूक्ष्मवतन में ब्रह्मा बाबा, शिवबाबा से अव्यक्त
रूप में अव्यक्त मुलाकात करें, तो वहाँ भी हलचल नहीं है, एकाग्रता है। एकाग्रता से
मन को ऐसा स्थित करो जो मन हलचल में न आये। ऐसी साधना ही कर्मातीत अवस्था की निशानी
है। जिस लक्ष्य से हम योग करने के लिए बैठें, उस समय सेवा का संकल्प भी न आये, ऐसी
कन्ट्रोलिंग पावर हो। तो साधना का अर्थ है एकाग्रता से उस श्रेष्ठ स्थिति में स्थित
रहना।
6. साधना में कोई भी साधन अपनी ओर खीचे नहीं। साधन, साधना को हिलावें नहीं। साधन
यूज़ तो करना है लेकिन हमारा मन खींचे नहीं। जैसे कमल पुष्प कीचड़, पानी में रहता
है लेकिन पानी की एक बूँद भी उसको स्पर्श नहीं करती है। ऐसे साधनों को यूज़ करने के
लिए कोई मना नहीं है लेकिन साधन हमारी स्थिति को नीचे ऊपर न करें क्योंकि अन्त समय
में परिस्थितियाँ बदली हुई होंगी, प्रकृति भी पेपर लेगी, साधन होते हुए भी यूज़ नहीं
कर पायेंगे। कोई भी साधन कभी भी धोखा दे सकते हैं इसलिए साधन होते हुए भी हमारे मन
के स्थिति को हिलावें नहीं, बिल्कुल जैसे कमल पुष्प समान रहें। यूज़ किया, आनन्द
लिया और अगर नहीं हैं तो उसमें हलचल में नहीं आवे ऐसी स्थिति को कहा जाता है साधना।
7. वर्तमान समय साधनों के विस्तार में बहुत चले गये हैं और सार जो साधना है उसमें
थोड़ी कमी पड़ गई है। अभी बाबा हमसे चाहता है कि बच्चों की साधना ऐसी पक्की हो जो
कोई भी साधन हमको हिला न सकें। मान लो अभी हम शान्त में बैठे हैं, लाइट चली गई। तो
ऐसे नहीं यही संकल्प चलता रहे कि लाइट क्यों गई? लाइट के दफ्तर वाले अच्छे नहीं
हैं, काम करते ही नहीं, आजकल के हैं ही ऐसे... परन्तु मेरा काम यह नहीं है कि हम
उनका सोचें, ऐसे फालतू कॉमन संकल्प हमारे चल गये तो साधन ने मेरे मन की स्थिति को
खींच लिया। मन की स्थिति एकाग्र नहीं हुई! तो साधना पावरफुल नहीं रही।
8. कई बार हम कर्म कान्सेस हो जाते हैं, बॉडी कान्सेस भी नहीं होते, सोल कान्सेस भी
नहीं हैं, कर्म कान्सेस हो जाते हैं जैसेकि यह काम ऐसे करना है, यह किया, यह ठीक
हुआ, यह नहीं हुआ... ऐसे नेचरल कर्म कान्सेस का संकल्प चलता है लेकिन जिस कर्म का
अभ्यास है वह कर्म करते हुए हम साधना में रहें। हाथ-पांव का जो काम है, वह बहुत
हल्का है तो उसमें बुद्धि को शिवबाबा के तरफ एकाग्र होके लगा सकते हैं। थोड़ा भी
टाइम मिला तो हम अपनी साधना में गुम हो सकते हैं। गुम होना माना ऐसे नहीं कि सिर्फ
अशरीरी हो जाएं, लेकिन इसके साथ कन्ट्रोलिंग पावर भी चाहिए। अगर हमारी साधना अच्छी
है तो कोई भी उल्टा काम मेरे से नहीं हो सकता है।
9. जैसे ट्राफिक कन्ट्रोल के समय हम टाइम निकालते हैं, ऐसे हम बीच-बीच में थोड़ा
समय भी निकालें तो साधना का अनुभव कर सकते हैं लेकिन इसमें अटेन्शन और अभ्यास चाहिए,
मन पर कन्ट्रोलिंग पावर चाहिए। लेकिन कन्ट्रोंलिग पावर तब आयेगी जब यह मुझे निश्चय
हो कि मैं मालिक हूँ, आत्मा हूँ। उस मालिकपने के नशे से आप स्वयं को कन्ट्रोल कर
सकते हो।
10. जिनका एक बाबा से दिल का प्यार है उनको याद की मेहनत नहीं करनी पड़ती। बस, बाबा
कहा और बाबा में समा गये, यानि लव में लीन हो गये। यह लवलीन अवस्था ऐसी है जो दो
अलग-अलग होते भी एक हैं। लवलीन माना लव में एकदम समा जायें और कुछ नज़र नहीं आये।
जैसे सागर में खो गये तो वह लवलीन अवस्था जो है वह प्यारी और ऊंची है। कर्म का
बन्धन चाहे पास्ट का, चाहे वर्तमान का खींचे नहीं। कर्म करें लेकिन न्यारे होकर
कर्म भी पूरा करें और जिसके साथ कर्म में आते हैं, उससे भी प्यारे बनें और बाबा के
भी प्यारे बनें। इसे ही विदेही अवस्था भी कहा जाता है।
11. अभी भी साधना करने का समय है। लेकिन जब हलचल शुरू हो जायेगी तो उस हलचल का सामना
करने में भी टाइम देना पडेगा। उस समय अभ्यास नहीं होगा फिर साधना नहीं कर सकेंगे और
हलचल में टिक नहीं सकेंगे इसीलिए बाबा बार-बार भिन्न-भिन्न रूप से इशारा दे रहा है।
एक तो कर्म के बन्धनों को चेक करो, एकदम मैं क्लीन हूँ? किसी भी तरफ लगाव तो नहीं
है? कोई गुण या कोई स्वभाव के प्रति किसी से विशेष आकर्षण तो नहीं है? सच्ची और
पावरफुल साधना के लिए हमारे मन का लगाव कहाँ भी नहीं होना चाहिए। मन बुद्धि को
क्लीयर रखना - यह साधना के लिए बहुत जरूरी है। अच्छा ओम् शान्ति।
"दादी जानकी जी की अनमोल शिक्षायें"
(विशेष पुण्य स्मृति दिवस निमित्त)
1. याद अच्छी तब रहेगी जब हर बात में बाबा को फॉलो करने की लगन होगी। भक्ति में तो
सिर्फ फालोअर कहने मात्र होते हैं क्योंकि फॉलो कहाँ करते हैं। सिर्फ गुरू में भावना
होती है, बस। अनेक गुरू करने के बजाए एक को गुरू मान करके उसी में भावना रखते हैं।
लेकिन यहाँ हमारी एक बाबा में भावना भी है तो विश्वास भी है।
2. हम सबको पहले खुद में निश्चय हुआ फिर बाप में, ड्रामा में निश्चयबुद्धि बनें, इसी
निश्चय से विजयी बने हैं। संगम पर हमारा हीरो हीरोइन पार्ट है। सारे कल्प में हम
ऊंचा पार्ट बजाने वाली आत्मा हैं, यह बुद्धि ने न सिर्फ समझा है पर दिल से मान लिया
है। तो उसका अन्दर से अनुभव होने लगा है, निश्चय ने अनुभव करा लिया है तो भावना बैठ
गई है। निश्चय समझ से हुआ है इसलिए कोई संशय उठता ही नहीं है।
3. चेक करो खुद में, बाप में या ड्रामा में या कोई भी बात में कभी क्वेश्चन मार्क
तो नहीं उठता कि यह क्यों, यह क्या... व्हाय, व्हाट, व्हेन... इन सबमें डब्ल्यू
लिखना बड़ा डिफीकल्ट है। एक बाबा दूसरा विक्ट्री (विजयी) जो इन दो बातों को समझ जाता
है वो होली और योगी बन जाता है।
4. हम सब आत्मायें भाई-भाई हैं और ब्राह्मण भाई बहन हैं तो दृष्टि एकदम आत्मा की
तरफ जाती है। परमात्मा मेरा बाप है, हम सब उसके ही बच्चे हैं। जब हमारी दृष्टि
भाई-भाई की बन जाती है, तो अशरीरी स्थिति भी सहज बन जाती है। अगर आत्मा की दृष्टि
से नहीं देखेंगे तो रूह में रूहानियत की खुशबू नहीं आ सकेगी।
5. बाबा हमें कर्म से जो गुण सिखाता है वह गुण औरों को भी बाबा की तरफ खींचते हैं।
बच्चा है, बूढ़ा है सिर्फ मुस्कराके कोई पानी का ग्लास भी देवे तो कितना अच्छा लगेगा
और बिना मुस्कराये कोई खाना भी देवे तो इतना अच्छा नहीं लगेगा। तो सदा यह नशा रहे
कि हम किसके साथ रहते हैं? मेरे को कौन पढ़ाता है? बाबा तो बहुत अच्छा है, हमें बाबा
अच्छा लगता है पर बाबा को अच्छा कौन लगेगा? जो अच्छा पढ़ेगा।
6. सवेरे अमृतवेले बाप है, क्लास के समय टीचर है। सेवा के समय हमारा योग कैसा हो वह
भी बाबा हमें बताता है। सुबह अमृतवेले उठना कैसे, बैठना कैसे.. वो भी सिखाता है। उस
घड़ी कुछ नहीं कहता है, पर अपनी आकर्षण से खींचता है। टीचर खींचता नहीं है, बाबा
खींचता है।
7. पढ़ाई में कितना बार मीठे बच्चे, मीठे बच्चे कह कह करके अन्दर से सारा कडुवापन
निकाल देता है। ब्राह्मण कुल की शोभा बढ़ाने वाले स्वदर्शन चक्रधारी बच्चे बनते
हैं। पढ़ाने वाला जैसे पढ़ा रहा है, वैसे ध्यान दे करके पढ़ना है। श्रीमत को अच्छी
तरह से जानकर, मानकर उस पर चलना है। कभी मनमत नहीं चलानी है। इसमें अपना भाव-स्वभाव,
संस्कार काम नहीं करें। तो बाबा देखकर खुश होगा कि यह बच्चा अच्छा पढ़ता है। अच्छा
पढ़ने वाले बच्चे को बाप अपनी गोद में बिठाता है।
8. किसी में रूसने की आदत है तो यह सबसे बुरी आदत है। जो आपस में अपने बहन भाई से
रूसते या किसी से भी रूसते हैं तो वो एक दिन बाबा से भी रूसने लग पड़ते हैं क्योंकि
आदत पड़ गई। कई हैं जो खुद जब बच्चे थे तो लड़ते थे, जब बच्चे पैदा किये तो भी लड़
रहे हैं। बाबा हमारी वह सब आदतें चेंज करता है। स्वदर्शन चक्र घुमाओ तो पहले की सब
आदतें बदल जायेंगी और तुम बदलेंगे तो चैरिटी बिगन्स एट होम, आपे ही घर वाले चेन्ज
हो जाते हैं।
9. कई बार घर वालों को चेन्ज करने में थोड़ा टाइम लगता है क्योंकि हिसाब-किताब होता
है। कोई अच्छा मानेंगे, कोई बुरा मानेंगे पर बाहर वाले बदलाव देखकर जब अच्छा कहते
हैं तब घर वाले पीछे जागते हैं, यह भी कईयों का मिसाल है। पढ़ाई से हमारा चरित्र
ऊंचा होता है। सिर्फ बी. के. बने सफेद साड़ी पहनी तो कहेंगे सफेद कपड़ों की लाज रखो।
रंगीन कपड़े पहनते तो तुम्हारी मर्जी थी पर अब सफेद कपड़े पहने हो तो सफेद कपड़ों
की लाज रखो।
10. जो अच्छी रीति पढ़ाई पढ़ते हैं वो महारथी बन जाते हैं। नहीं पढ़ते हैं तो
घोड़ेसवार हैं, और जो धीरे धीरे आराम से चल रहे हैं वो हैं प्यादे। जहाँ जो मर्जी
कर रहे हैं, चल रहे हैं, वो ब्राह्मण थोड़ेही हैं। डायनिंग हॉल में बैठकर ऐसी बातें
कर रहे हैं जैसे होटल में बैठकर बातें कर रहे हैं, मौज कर रहे हैं।
11. बाबा ने हम सबको ब्राह्मण जीवन के नियम संयम बताये हैं। अगर हम चलते फिरते, खाते
पीते हैं तो यह शोभता नहीं है। खुशी में शान्ति से बैठकर याद में खाओ पीओ तो थोड़े
में ही ताकत मिल जाती है। तो बड़े प्यार से, बड़ी एकाग्रता से ब्रह्माभोजन करना है
क्योंकि ब्रह्माभोजन बहुत पॉवरफुल है, इसके लिये कहते हैं कि देवतायें भी तरसते
हैं। सतयुग में देवताओं को यह ब्रह्माभोजन थोडेही मिलेगा। ऐसा भण्डारा और ऐसे भोजन
बनाने वाले भी नहीं होंगे, भोग भी नहीं लगेगा, इसलिए अभी भोग लगाने वाले को भी
एक्यूरेट लगाना है। बनाने वाले को भी एक्यूरेट बनाना है और खाने वाले भी उसी महत्व
से खाना है कि हम ब्रह्माभोजन खा रहे हैं।
12. जो स्वदर्शन चक्रधारी ब्राह्मण हैं उन्हें स्मृति रहती हम सो, सो हम... हम सो
थे वो अभी हम बन रहे हैं। इस शरीर में होते हुए चेक करो कि ज्ञान में आने से पहले
मेरा संकल्प कैसा था? अब कैसा है? वन्डरफुल। रहम, सच्चाई, प्रेम संकल्प में आ गया
है। अगर मेरे संकल्प में रहम नहीं है तो वो कोमल दिल है या कठोर दिल है। हमारे दिल
में रहम, सच्चाई और प्रेम हो तो संकल्प दृष्टि और कर्म भी ऐसे ही होंगे। उसमें अगर
कोई साधारणता है तो चलने फिरने सोचने में भी साधारणता होगी। भले बुद्धि बहुत अच्छी
है पर रहमदिल नहीं है, किसके दिल को जल्दी समझ करके बाबा से उनको मदद दिलावे वो
अन्दर से बुद्धि काम नहीं करती है।
13. निश्चय और भावना दोनों जब कम्बाइण्ड हैं तो विश्वास जल्दी बैठ जाता है। कहेगा
सुना था कुछ और, देखा कुछ और। कईयों का यहाँ आ करके, देखने से, अनुभव करने से
विश्वास बैठ जाता है क्योंकि रहम, स्नेह, सच्चाई का अनुभव किया, जो दुनिया में कहीं
से भी किसको यह अनुभव हो नहीं सकता। कुछ न कुछ स्वार्थ भाव होगा। वो भले बाप बेटा
हो, उसकी मर्जी से नहीं चला तो कहेगा तू मेरा बेटा नहीं है या तो बाप, बाप नहीं है।
यहाँ तो बाप बेटे का सम्बन्ध जुटता है, पर भाई भाई, बहन भाई का सम्बन्ध भी जुटता
है। किसी बाहर वालों को कहो कि तुम मेरा भाई हो तो उनको इतनी खुशी होती है, बात मत
पूछो। पूरा ज्ञान सुनने से पहले उनको इसी एक शब्द से विश्वास होने लगता है। तो हमारा
बहन भाई का जो रिस्ता है वो बड़ा सुखदाई है। भाई-भाई की दृष्टि से सृष्टि महासुखकारी
बन जाती है।
14. भाई-भाई की दृष्टि का कोर्स बड़ा है, इसमें जो पास हुआ उसका बेडा पार। जैसे
मम्मा समान सदैव रूहानियत में रहने से बाबा अपनी शक्ति भर देता है तब तो आत्मा में
शिव की शक्ति भरेगी और शिवशक्ति के रूप में गायन होगा। शिव मेरा साथी तो क्या बल्कि
शिव की शक्ति मेरे पास है। तो साक्षी हो करके पार्ट प्ले करना, यह हीरो पार्टधारी
की निशानी है। हीरो जो होता है, वो हर पार्ट के बीच में हाज़िर होता है फिर भी उसका
सबसे न्यारा पार्ट होता है इसलिए सबको अच्छा लगता है।
15. हमें पास विथ ऑनर होना है तो ऐसा श्रेष्ठ पार्ट बजाना है। ऐसे नहीं पास होने
जितनी मार्क्स मिली तो खुश हो जाये। शान उसी में है जो हीरो पार्ट बजाये। कोई भी
बात हुई साक्षी हो करके पार्ट प्ले किया, बाबा साथी है, मेरे को साक्षी बना करके
अच्छा पार्ट प्ले करना सिखाया है। हम हर पार्टधारी के पार्ट में साक्षी हैं। तो
साक्षीपन की स्टेज पर रहते अपना पार्ट बजाना और शिव बाप को साथी बना देना तब कहेंगे
शिव और शक्ति दोनों कम्बाइन्ड हैं।
दादी प्रकाशमणि जी के अमृत वचन
"लाइट बन लाइट की दुनिया में रहने का अभ्यास करो तो मैं पन स्वतः समाप्त हो जायेगा"
1. बाबा कहते मैं आया हूँ तुम बच्चों को अपने समान विदेही बनाने। दूसरा - बच्चे मैं
पन को त्यागो। जहाँ मैं है उसे छोड़ बाबा-बाबा करो। हम निमित्त हैं। तीसरा अपने
कैरेक्टर्स पर ध्यान दो क्योंकि तुम्हें देवता बन स्वर्ग का मालिक बनना है।
2. तो हर एक चेक करे कि हमारे मन में कहाँ तक शुद्ध संकल्प चलते हैं? कहाँ तक हम मन
का मालिक राजा बन, मन वजीर को बाकायदे शुद्ध संकल्पों में, मनन-चिंतन में रखते हैं?
या मैं-मैं के देह-अभिमान में व्यर्थ संकल्प चलते हैं? स्व के बदले पर को (दूसरे
को) देखते-सोचते, संकल्प करते या ज्ञान सागर बाप के ज्ञान के खज़ाने का मनन करते
हैं? मन के संकल्प सर्व प्राप्तियों में मगन रहते हैं? सर्व प्राप्तियों के खज़ानों
को पाकर अपार खुशियों में रहते हैं?
3. मन के संकल्प पॉजिटिव चलते या निगेटिव चलते ? हर प्रकार के निगेटिव थॉटस् को
परिवर्तन कर पॉजिटिव सोचो। जितना-जितना पॉजिटिव सोचेंगे उतना मन की शुद्धि होती
जायेगी, एकाग्रता बढ़ती जायेगी। पॉजिटिव में भी स्व का चिंतन विशेष करना है। पर को
देखने के बदली स्व को देखो।
4. आप यह कभी नहीं सोचो कि मैं सेवाधारी हूँ परन्तु आप ईश्वरीय सेवाधारी हैं। तो
हमारा हर संकल्प, हर बोल, हर कदम सेवा में है या ईश्वरीय सेवा में है? यदि मैं सेवा
में हूँ तो भी कहीं देह-अभिमान या मैं-पन आ जाता है। लेकिन मैं हूँ ही ईश्वरीय सेवा
पर तो मेरा जो भी खाता है वह बाबा की दरबार में जमा है। तो हर एक अपना ईश्वरीय खाता
चेक करो।
5. बाप को प्रत्यक्ष करने के लिए हमें स्वयं में क्या धारणा करनी है? कई बार बाबा
ने मुरली में कहा है तुम्हारा संकल्प, बोल, तुम्हारा चेहरा ही बाप का साक्षात्कार
करायेगा। यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी बाबा ने हम सबको दी है कि तुम्हें बाप को
प्रत्यक्ष करना है, उसके लिए खुद को देखो कि मैं बाप समान सम्पन्न बना हूँ? बाप
समान सम्पन्न बनना माना ही सर्व विघ्नों से ऊपर निर्विघ्न अवस्था बनाना। सम्पन्न
बनने का अर्थ है कि सर्व कमियों-कमजोरियों को समाप्त करना है।
6. जैसे पढ़ाई में परीक्षा के दिन होते तो होशियार स्टूडेन्ट का लक्ष्य होता कि मुझे
फर्स्ट डिवीजन में पास होना है, पास विद आनर बनना है। जब हम पास विद ऑनर्स हों तब
तो धर्मराज की सजाओं से मुक्त हों। धर्मराज बाबा हमारा स्वागत करे। बाबा हमें अपनी
भुजाओं में वेलकम करे। बाबा कहे ओ मेरे समान बच्चे! आओ। बाबा के समान की हमें
मार्क्स मिलें।
7. हर एक अपने आपको इतनी ऊंची दृष्टि से देखो कि बरोबर हम ऊपर में बाबा के साथ
फरिश्तों की दुनिया में उड़ रहे हैं। नीचे में आकर, व्यक्तियों को देख व्यक्तित्व
में अपना समय, शक्ति खर्च नहीं करो। यह बहुत बड़ी सूक्ष्म स्थिति बनाने की चैलेंज
बाबा ने हमें दी है। कोई भी बात व्यक्त में आकर करेंगे तो जैसे पत्थर तोडेंगे लेकिन
ऊपर से उड़ जाओ तो सभी बातें सहज ही क्रॉस हो जायेंगी माना निवारण हो जायेंगी।
8. जितना भी टाइम साइलेन्स में बैठो उतना समय गहरा अनुभव करो कि हम इस देह से परे
उड गये हैं। उड़ना माना विदेही बन फरिश्तों की दुनिया में पहुँच जाना। जितना लाइट
बन लाइट की दुनिया में, फरिश्ते स्थिति में रहने का अभ्यास करेंगे उतना आटोमेटिक
मैं-पन निकल जायेगा। और जितना यह अभ्यास करेंगे उतना जो भी कोई कमजोरी होगी,
अपवित्रता के संस्कार आदि जो भी कुछ है वह सब खत्म हो जायेंगे।
9. अभी सबको यही शुभ संकल्प करना है कि 1- मुझे बाबा के समान सम्पन्न फरिश्ता बनना
है। 2. हमें इस विश्व की स्टेज पर अपने चलन-चेहरे, संकल्प, बोल से बाबा को
प्रत्यक्ष करना है। हमारे वायब्रेशन ऐसे हों जो सभी कहें कि आप धन्य हैं। आप लोगों
को भगवान ने ही पढ़ाया है और पढ़ा भी रहा है। यह संस्था देहधारियों की नहीं है, यह
संस्था गुरू-चेलों की नहीं है परन्तु सभी ब्रह्माकुमार/ब्रह्माकुमारियाँ परमात्मा
से पढ़ाई पढ़के परमात्म प्यार में लवलीन होने वाले हैं।
10. हमें यह बहुत नशा है कि हम इस संगम पर कितने लक्की हैं, कितने महान भाग्यवान
हैं जो वरदाता बाप ने हमें सर्व वरदानों से भरपूर किया है। लोग कृपा मांगते, हमें
तो पल- पल, कदम-कदम पर बाबा वरदानों से भरपूर कर रहा है। तो क्या यह दिल में नहीं
आता कि हम ऐसा भरपूर बन, परम आनन्द का अनुभव करें। हम प्रभु को अर्पण हैं। कोई पूछे
तो हम छाती पर हाथ रखकर कहते हैं कि हमने परमात्मा को पाया है।
12. माया की शक्ति रावण का राज्य अब पूरा हुआ। अब उसकी विदाई कर दो। अन्त में उसे
मुँह झुका के ही जाना है। अभी तुम्हें जितना सामना करना है, कर ले, मैं तुम्हें
पांव में झुकाने वाला हूँ। ऐसी नज़रे तेज हों, इन नयनों में बाबा की इतनी शक्ति
भरकर रखो जो मज़ाल है यह नयन कहाँ नीचें देखें। कोई कभी कहता जरा दृष्टि चंचल होती
है, तो हम कहती हूँ याद करो भगवानुवाच - हे मेरे नज़रों से निहाल होने वाले बच्चे।
तो बोलो, हे पाण्डव इतनी शक्ति से भरपूर हो? हम निहाल हो गये। बाबा की नज़रों में
हम हैं, हमारी नज़रों में तुम हो। चाहे कहाँ भी रहें, किधर भी रहें, कुछ भी मिले,
कुछ भी खायें। ऐसी अपनी निहाल स्थिति हो। अच्छा ओम् शान्ति।