Patrapushp of May 2026


 

मधुबन ओम् शान्ति अंक 406 मई 2026

 

“नॉलेजफुल बन हलचल की परिस्थितियों में अपनी अचल अडोल, एकरस स्थिति वनाओ” निमित्त टीचर्स तथा सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई-बहनों प्रति शुभ प्रेरणायें - 20-04-26

 

प्राणप्यारे अव्यक्त बापदादा के अति लाडले, ड्रामा के ज्ञान की शक्ति को प्रैक्टिकल जीवन में धारण कर अपनी अचल अडोल और एकरस स्थिति बनाने वाली निमित्त टीचर्स बहिनें तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय मधुर याद स्वीकार करना जी । बाद समाचार - शान्तिवन में चली हुई वार्षिक मीटिंग बड़े उमंग-उत्साह के साथ सम्पन्न हुई। इस मीटिंग में देश विदेश के करीब 2100 भाई बहिनों ने भाग लिया। 2026-2027 के लिए विशेष स्व-उन्नति और विश्व कल्याण की सेवाओं के सभी ने बहुत अच्छे-अच्छे प्लैन बनाये। अभी अपने यज्ञ को 90 वर्ष पूरे हो रहे हैं तो सबके अन्दर यही उमंग दिखाई दिया कि सेवाओं के 90-90 प्रोग्राम करके हमें अपना तन-मन-धन, समय, शक्ति सब विश्व कल्याण की सेवा में सफल करना है। इस बड़ी मीटिंग के पश्चात दो दिन के लिए मुख्य टीचर्स बहिनों ने मई-जून और जुलाई यह 3 मास विशेष मन और मुख का मौन रख तपस्या द्वारा अपने मनोबल को बढ़ाने तथा विशेष मन्सा शक्तियों द्वारा सेवा करने का संकल्प लिया। मीठे बाबा की हम बच्चों प्रति यही शुभ आश है कि बच्चे अब स्वयं को व्यर्थ संकल्पों से मुक्त रख, बुद्धि को स्वच्छ साफ बनायें ताकि समय पर परमात्म टचिंग को कैच कर सकें। अब ऐसी कन्ट्रोलिंग और रूलिंग पावर हो जो एक सेकण्ड में मन-बुद्धि को जहाँ चाहें वहाँ टिका सकें, इसके लिए बीच-बीच में अपने संकल्पों की ट्रैफिक को कन्ट्रोल करना, अपने स्व-स्वरूप और स्वधर्म में स्थित होने का अभ्यास करना बहुत जरूरी है क्योंकि समय अनुसार दुनिया में अनेक प्रकार की हलचलें बढ़ती जा रही हैं, चारों तरफ तनाव व भय का वातावरण है, प्रकृति भी सब तरफ अपना विकराल रूप दिखा रही है। इन सब परिस्थितियों में बाबा के बच्चों की स्थिति सदा अचल अडोल एकरस रहे, उसके लिए हर एक को अभी सर्व शक्तियों से सम्पन्न, नॉलेजफुल बनने की आवश्यकता है। अभी अनुभवी बन औरों को भी अनुभव कराने का समय है इसलिए सदा समर्थ बन निर्बल आत्माओं को भी समर्थ बनाना है। अब कोई भी निर्बलता का संस्कार स्वयं में न हो । बाबा कहते बच्चे, कैसा भी दर्दनाक वायुमण्डल देखकर घबराना नहीं, सदा निर्भय रहना । कोई भी समाचार सुनते, देखते ड्रामा की बनी हुई भावी पर अडोल रह अपनी शक्तिशाली मन्सा द्वारा शान्ति और शक्ति की सकाश देते रहना। अभी किसी भी प्रकार के प्रश्नों में उलझने के बजाए अपनी मास्टर सर्वशक्तिवान की सीट पर सेट होकर हर दृश्य को साक्षीदृष्टा बन देखते, शुभ भावना की किरणें देनी है। ऐसी अनेकानेक मधुर शिक्षाओं से बापदादा हम बच्चों का शृंगार करते रहते हैं। बाबा की यह शिक्षायें ही हम सबकी रक्षा करती हैं। तो बोलो, सभी बाबा के नूरे रत्नों सेवाओं के साथ-साथ अपनी एकरस स्थिति बनाने का भी पूरा ध्यान है ना! जितना हो सके अब अन्तर्मुखी रह, एकान्तवासी बन एकाग्रता का अभ्यास करना है। सदा बाबा के साथ कम्बाइन्ड रहना है। अच्छा - आप सबका स्वास्थ्य ठीक होगा। मैं कुछ समय के लिए अमेरिका सेवा पर पहुंच गई हूँ। सबको बहुत-बहुत याद.... ईश्वरीय सेवा में, A के मोहिनी मुख्य प्रशासिका, ब्रह्माकुमारीज़

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ये अव्यक्त इशारे सदा अचल, अडोल, एकरस स्थिति का अनुभव करो

1) समय प्रमाण अब सदा अचल अडोल सर्व खजानों से सम्पन्न रहो। थोड़ा भी डगमग हुए तो सर्व खजानों का अनुभव नहीं होगा। बाप द्वारा मिले हुए खजानों को सदा कायम रखने का साधन है सदा अचल अडोल रहना। अचल रहने से सदा ही खुशी की अनुभूति होती रहेगी। जैसे विनाशी धन, नाम-मान- शान, कुर्सी आदि मिलती है तो खुशी होती है ना। यह तो अविनाशी खुशी है लेकिन यह खुशी उसे रहेगी जो अचल अडोल, एकरस स्थिति में रहेंगे ।

2) समय प्रति समय अनेक प्रकार के विघ्न आते हैं, कोई अच्छे अनन्य स्टूडेंट माया के वशीभूत हो एन्टी हो जाते और सेवा में डिस्टर्ब करते हैं। ऐसे समय पर घबराते तो नहीं हो! एक होता है उनके प्रति कल्याण के भाव से तरस रखना, लेकिन उसके कारण हलचल में आना अथवा व्यर्थ संकल्प चलाना, यह है हिलना। जो हर आत्मा के पार्ट को साक्षीदृष्टा स्थिति में रह देखते हैं, वह अचल अडोल एकरस रहते हैं ।

3) किसी भी वातावरण में, वायुमण्डल में रहो लेकिन स्थिति सदा अचल-अडोल एकरस हो । कभी निमित्त बने हुए कोई राय देते हैं, उनमें कनफ्यूज़ नहीं होना, क्योंकि जो निमित्त बने हैं वह अनुभवी हो चुके हैं। अगर उनका कोई डायरेक्शन स्पष्ट नहीं भी है तो भी हलचल में नहीं आना । धैर्य से कहो इसको समझने की कोशिश करेंगे तब स्थिति एकरस अचल, अडोल रहेगी।

4) दुनिया की किसी भी प्रकार की हलचल अचल अडोल स्थिति में विघ्न न डाले। ऐसे विघ्न विनाशक अचल अडोल बन हर विघ्न को पार कर लो, जैसे यह विघ्न नहीं एक खेल है। पहाड़ राई के समान अनुभव हो क्योंकि नॉलेजफुल आत्मायें पहले से ही जानती हैं कि यह सब तो आना ही है, होना ही है

5) जिसको ड्रामा के ज्ञान की शक्ति प्रैक्टिकल जीवन में धारण है वह कभी भी हलचल में नहीं आ सकते । सदा एकरस, अचल अडोल बनने और बनाने की विशेष शक्ति यह ड्रामा की प्वाइंट है। इसे शक्ति के रूप में धारण करने वाले कभी हार नहीं खा सकते। इस कल्याणकारी ड्रामा की हर सीन में कोई न कोई कल्याण समाया हुआ है, धैर्यवत बन साक्षी हो देखने का अभ्यास करो तो अचल अडोल रहेंगे।

6) अभी अनुभवी बन औरों को भी अचल अडोल बनाने का, अनुभव कराने का समय है। अभी खेल करने का समय समाप्त हुआ। अब सदा समर्थ बन निर्बल आत्माओं को समर्थ बनाते चलो। आप लोगों में निर्बलता के संस्कार होंगे तो दूसरों को भी निर्बल बना देंगे। ज्ञान की हर प्वाइंट का अनुभवी बनने के लिए एकान्तप्रिय बनो, एकाग्रता का अभ्यास बढ़ाओ।

7 ) किसी भी प्रकार की हलचल में अचल रहना, यही श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माओं की निशानी है। दुनिया हलचल में हो लेकिन आप श्रेष्ठ आत्मायें हलचल में नहीं आ सकती । क्यों? ड्रामा की हर सीन को जानते हो। नॉलेजफुल आत्मायें, पावरफुल आत्मायें सदा स्वत: ही अचल रहती हैं। तो कभी वायुमण्डल से घबराओ नहीं, सदा निर्भय रहो ।

8) कोई भी दर्दनाक सीन देखते हुए नथिंग न्यु । जिन्हें यह नथिंग न्यू का पाठ पक्का है वह घबरा नहीं सकते। क्या हुआ, कैसे हुआ, यह हुआ... समाचार सुनते, देखते भी ड्रामा की बनी हुई भावी को शक्तिशाली बन देखते और औरों को भी शक्ति देते चलो। दुनिया वाले घबराते और आप एकरस स्थिति में रह उन आत्माओं में शक्ति भरते । जो भी सम्पर्क में आये, उसे शक्तियों का, शान्ति का दान देते चलो।

9) सदा मास्टर सर्वशक्तिवान की सीट पर सेट रहने वाले ही अचल अडोल रहते हैं । बापदादा कहते हैं बच्चे शरीर भी चला जाये लेकिन आपकी खुशी नहीं जाये। पैसा तो उसके आगे कुछ भी नहीं है, जिसके पास खुशी का खजाना है उसके आगे कोई बड़ी बात नहीं और सदा सहयोगी सेवाधारी बच्चों के साथ बापदादा रहते हैं इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है।

10) आप बच्चे मास्टर प्रकृति-पति हो, इस प्रकृति के खेल को देख हर्षित होते रहो। चाहे प्रकृति हलचल करे, चाहे प्रकृति सुन्दर खेल दिखाए, दोनों में प्रकृति-पति आत्मायें साक्षी हो खेल देखती और खेल में मज़ा लेती हैं, घबराती नहीं हैं इसलिए बापदादा तपस्या द्वारा साक्षीपन की स्थिति के आसन पर अचल अडोल स्थिर रहने का विशेष अभ्यास करा रहे हैं ।

11) कोई भी बात हो जाए चाहे प्रकृति की, चाहे व्यक्ति की, दोनों अचल स्थिति के आसन को ज़रा भी हिला न सकें । इतने पक्के हो ना! जैसे देखो शरीर आसन पर नहीं टिक सकता तो हलचल करेगा ना! ऐसे मन हलचल तो नहीं करता? सदा अचल अडोल, ज़रा भी हलचल नहीं हो। अगर कभी हलचल और कभी अचल है तो सिंहासन भी कभी मिलेगा, कभी नहीं मिलेगा। है

12) कितना भी कोई हिलावे लेकिन आप अचल रहो। परिस्थिति श्रेष्ठ है या स्वस्थिति श्रेष्ठ है? कभी परिस्थिति वार तो नहीं कर लेती है? सोचो, कि ये परिस्थिति पावरफुल है या स्वस्थ पावरफुल है? तो इस स्मृति से कमज़ोर से शक्तिशाली बन जायेंगे। जैसे आप तपस्वी एकरस स्थिति में एकाग्र होते हो तो हठयोगी फिर एक टांग पर खड़े हो जाते हैं। तो कहाँ एकरस स्थिति और कहाँ एक टांग पर स्थित रहना, फ़र्क हो गया ना!

13) अपने आपको चेक करो हर शक्ति का, हर प्राप्ति का, हर गुण का अनुभव है? अगर अनुभव की अथॉरिटी है तो कोई भी परिस्थिति अनुभव की अथॉरिटी के आगे कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकती। अनुभवी मूर्त कभी भी किसी भी परिस्थिति में अचल अडोल रहते हैं । हलचल में नहीं आते क्योंकि सबसे बड़े में बड़ी अथॉरिटी अनुभव है। आह्वान करो जिस समय जिस शक्ति का वो सेकण्ड में सहयोगी बनेगी।

14) हम ऊंच ते ऊंच बाप के बच्चे हैं, यह याद रहने से एकरस अवस्था रहेगी। जब एक से सम्बन्ध रहता है तब अवस्था भी एकरस रहती है। अगर और कहाँ सम्बन्ध की रग जाती है तो एकरस अवस्था नहीं रहेगी। तो एकरस अवस्था बनाने के लिए सिवाए एक के और कुछ भी देखते हुए न देखो।

15) आपके एकरस अचल स्थिति का ही यह अचलघर यादगार है। जैसे बापदादा एकरस रहते हैं वैसे बच्चों को भी एकरस रहना है। जब एक के ही रस में रहेंगे तो एकरस अवस्था में रहेंगे। क्यों शब्द की निशानी क्वेश्चन मार्क सभी से टेढ़ा होता है । जब क्यों, क्या शब्द निकल जायेगा तब ड्रामा की भावी पर एकरस स्थेरियम रह सकेंगे।

16) जैसे साकार बाप ने अथक और एकरस स्थिति का एक्जैम्पुल बनकर दिखाया, वैसे आप बच्चों को भी औरों के प्रति एक्जैम्पुल बनना है, यही सर्विस है। सर्विस सिर्फ वाणी से ही नहीं होती, स्थिति से भी सर्विस होती है। तो समय प्रमाण अब अपनी स्थिति एकरस बनाओ।

17) जो आलराउण्ड सर्विस करने वाले हैं उन्हें विशेष इस बात का ध्यान रखना है कि कैसी भी परिस्थिति में अपनी स्थिति एकरस रहे तब सफलता मिलेगी। श्रीमत में जब मनमत, देह- अभिमानपने की मत, शूद्र पने की मत मिक्स करते हो तब स्थिति एकरस नहीं रहती। मन भिन्न-भिन्न रसों में है तो स्थिति भी भिन्न-भिन्न है। एक ही रस में रहे तो स्थिति एकरस रहेगी ।

18) एकरस स्थिति बनाने के लिए सिवाए एक के और कुछ भी देखते हुए न देखो। यह जो कुछ देखते हो यह कोई भी वस्तु रहने वाली नहीं है। तो एकरस, स्थेरियम तब रह सकेंगे जब कोई भी दृश्य देखते क्यों, क्या की उत्पति न हो, यही व्यर्थ संकल्पों की हलचल का कारण है। इस क्यु की समाप्ति के बाद ही सम्पूर्णता आयेगी।

19) सदा उमंग-हुल्लास में एकरस रहने के लिए जो भी सम्बन्ध में आते हैं- चाहे स्टूडेन्ट, चाहे साथी सभी को सन्तुष्ट करने की उत्कंठा हो । जिसको भी देखो उससे हर समय गुण उठाते रहो। सर्व के गुणों का बल मिलने से सदाकाल के लिए उत्साह एकरस रहेगा। गुणग्राही बनो। अवगुणों को देखते हुए भी नहीं देखो।

20) बुद्धि को एक ठिकाने पर टिकाने की जो युक्ति मिली है, वह स्मृति में रखो। हिलने न दो । देह और देह की दुनिया से न्यारे बन, मन-बुद्धि के विमान से सेकण्ड में आकारी और निराकारी स्थितियों को अनुभव करो। बुद्धि को हिलने न दो, नहीं तो युद्ध में समय बहुत व्यर्थ जाता है। जैसे तपस्वी सदैव आसन पर बैठते हैं वैसे अपनी एकरस स्थिति के आसन पर विराजमान रहो तब भविष्य सिंहासन मिलेगा।

21) सभी से श्रेष्ठ तख्त बापदादा के दिल तख्तनशीन बनना है । लेकिन इस तख्त पर बैठने के लिए पहले अचल, अड़ोल, एकरस स्थिति का तख्त चाहिए। एकरस स्थिति के तख्त पर तब स्थित रह सकेंगे जब अकाल तख्त नशीन बनने का अभ्यास होगा। जैसे वह तपस्वी सदैव आसन पर बैठते हैं, ऐसे आप अपनी एकरस आत्मा की स्थिति के आसन पर विराजमान रहो। इस आसन को नहीं छोड़ो तब सिंहासन मिलेगा।

22) किसी भी प्रकार का विघ्न व समस्या अथवा माया का वार, वार नहीं है लेकिन खेल के समान अनुभव हो तो खेल समझने से खुशी-खुशी पार कर लेंगे और अवस्था एकरस रहेगी। लेकिन अगर इसे वार समझेंगे तो घबरायेंगे भी और हलचल में भी आ जायेंगे । माया का काम है आना और आपका काम है विजयी बनना।

23) आत्मिक स्थिति के अभ्यास से वायुमण्डल को रुहानी बनाओ तो और सब बातें स्वतः ठीक हो जायेंगी, सब एकमत और एकरस हो जायेंगे फिर माया भी नहीं आयेगी क्योंकि वायुमण्डल शक्तिशाली होगा। वायुमण्डल को शक्तिशाली बनाने के लिए याद के प्रोग्राम रखो और आपस में उन्नति के लिए रुह-रुहान की क्लासेज़ करो, स्नेह मिलन करो । धारणा की क्लासेज़ रखो तो सफलता मिल जायेगी।

24) सदा एक की याद में रहकर एकरस अवस्था बनाओ तो वन-वन और वन में आ जायेंगे। बाहर रहते हुए भी यही पाठ पक्का करो - ‘“सी फादर, फालो फादर", तो कभी किसी परिस्थिति में डगमग नहीं होंगे, ब्रह्मा बाप के सामने कितनी भी बातें आई लेकिन बातों को न देख एक बाप को ही देखा इसलिए नम्बरवन बना। तो फालो फादर ।

25) एकरस स्थिति बनाने के लिए कर्मयोगी बनो। कर्मयोगी के आगे कोई कैसा भी आ जाए वह स्वयं सदा न्यारा और प्यारा रहेगा। नॉलेज द्वारा जानेगा- इसका यह पार्ट चल रहा है। वह अच्छे को अच्छा समझकर साक्षी होकर देखेगा और बुरे को रहमदिल बन रहम की निगाह से परिवर्तन करने की शुभ भावना से साक्षी होकर देखेगा, यही एकरस स्थिति बनाने का साधन है।

26) एक धक से सौदा करने वाले एक के होने कारण सदा एकरस रहते हैं। बाकी जो थोड़ा-थोड़ा करके सौदा करते हैं- एक के बजाए दो नाव में पांव रखने वाले हैं, वह सदा कोई न कोई उलझन की हलचल में, एकरस नहीं बनते हैं, इसलिए सौदा करना है तो सेकण्ड में करो। दिल के टुकड़े-टुकड़े नहीं करो।

27) कोई भी संकल्प आये तो ऊपर देकर स्वयं नि:संकल्प होकर चलते जाओ। विचार देना, इशारा देना यह दूसरी बात है, हलचल में आना - यह दूसरी बात है । तो सदा एकरस। संकल्प दिया और निरसंकल्प बने । सदा ध्यान रहे कि मुझे कर्मेन्द्रिय जीत बनना है। कोई एक कर्मेन्द्रिय की आकर्षण भी एक बाप का बनने नहीं देगी। एकरस स्थिति में स्थित होने नहीं देगी।

28) सदा अचल-अडोल रहने के लिए स्व-उन्नति और सेवा की उन्नति में सदा बिजी रहो, सर्व के प्रति शुभ भावना रखो। सम्बन्ध के आधार पर पार्ट नहीं, सेवा के सम्बन्ध से पार्ट बजाओ। दूसरा - विनाशी साधनों को सहारा वा आधार नहीं बनाओ। यह सब निमित्त मात्र हैं, सेवा के प्रति हैं। सेवा अर्थ कार्य में लगाया और न्यारे। साधनों की आकर्षण में मन आकर्षित नहीं होना चाहिए।

29) सदा एकरस, अचल अडोल बनने और बनाने की विशेष शक्ति यह ड्रामा की प्वाइंट है। इसे शक्ति के रूप में धारण करने वाला कभी हार नहीं खा सकता, लेकिन पहले ड्रामा की बिन्दी लगाकर व्यर्थ संकल्पों को शुद्ध संकल्पों में परिवर्तन करो। फिर माया के आने वाले अनेक प्रकार के विघ्नों को ईश्वरीय लग्न के आधार से समाप्त करो।

30) एकरस का अर्थ यह नहीं कि पुरुषार्थ की रफ्तार सदा एक जैसी हो। एकरस अर्थात् सदा उड़ती कला की महसूसता रहे । सर्व सम्बन्धों की अविनाशी तार एक से जुटी हुई हो। एक बाप दूसरा न कोई - यह दृढ़ संकल्प हो, एक भी सम्बन्ध कम न हो, सर्व सम्बन्धों की डोर एक से बंधी हुई हो तब एकरस स्थिति स्वत: रहेगी।

31) जब आप बच्चे अपने इस भ्रुकुटि के तख्त पर, अकालमूर्त्त बन स्थित होंगे तो एकरस स्थिति के तख्त पर और बापदादा के दिल तख्त पर विराजमान हो सकेंगे। जब इस दैवी संगठन की मूर्त में एकरस स्थिति का प्रत्यक्ष रुप में साक्षात्कार हो तब बापदादा की प्रत्यक्षता समीप आये इसके लिए हर एक को बापदादा के संस्कारों में समान बनना होगा ।

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(त्रिमूर्ति दादियों के अनमोल वचन - रिवाइज क्लासेस) शिवबाबा याद है ? "

ओम् शान्ति टीचर माना निमित्त भाव, निर्मान और निर्मल वाणी से सेवा करने वाली " बाबा ने कहाँ कहाँ से ढूँढके टीचर बनाया है। कोई को किस कोने से, किसको किस कोने से चुना, कमाल तो बाबा की है। अभी बाबा ने तो कमाल की हमको चुना और टीचर बनाया, अभी हमको क्या करना है ? जो बाबा की आशायें हैं हमारे लिये वो पूर्ण करनी है क्योंकि टाइम का तो कोई भरोसा नहीं है। अचानक का पाठ तो बाबा कितने समय से सुना रहे हैं, तो हमको क्या बनना पड़ेगा? एवररेडी। समय को हम नहीं देखें, समय का इन्तजार नहीं करना है लेकिन अपना इन्तजाम सदा के लिये करना है। कोई भी समय सेकण्ड में आज आ जाये, कुछ भी हो जाये तो हम एवररेडी रहें। कल विनाश हो जाये तो तैयार हैं? तैयार तो हो जायेंगे लेकिन जो बाबा कहता है समान, सम्पन्न बनें वो तैयारी है? क्योंकि हमको बाबा के साथ राजधानी में आना है। ऐसे नहीं कहाँ भी आये, आयेंगे तो सही वो तो शरीर छूटना ही है। लेकिन नहीं जो लक्ष्य बाबा का है, टीचर को बाबा कितना बड़ा स्वमान देता है गुरूभाई । बच्चा भी नहीं कहता है, भाई कहता है जो भाई भाई होते हैं वो समान होते हैं। तो इतना टाइटल बाबा देता है उस टाइटल के अनुसार अपने को चेक करें । बाबा ने कहा है ब्रह्मा बाबा के समान और सम्पन्न बनने का लक्ष्य रखो। तो रोज़ अपने आपको चेक करें कि आज जो दिन बीता ब्रह्मा बाप के समान और सम्पन्न बीता ? रात को सोने से पूर्व बाबा को सारे दिन का पोतामेल सुनाओ। दिनचर्या के प्रमाण हमारा क्या क्या हुआ, वो रिजल्ट बाबा को सुनाना है। अच्छी बात यह है मानो हमारे से छोटी मोटी गलती हो गयी, संस्कार मिलाने में, कभी बिन्दी लगाने में देरी हो जाती है तो बाबा को फौरन सुनाकर बाबा से माफी ले लो क्योंकि बाबा कहते टीचर बनकर कोई धर्मराजपुरी में जाये यह बाबा को अच्छा नहीं लगता है। मानो आपने गलती की तो बाबा को दे दिया ना, तो दी हुई चीज़ कभी वापस नहीं ली जाती है। वो बुरा माना जाता है, मानो आप कोई चीज़ किसी को दे दो और फिर गलती से वह पत्र पुष्प मई 2026, अंक - 406 ' मधुबन गुल्जार दादी जी 13-12-11 आपके पास आ जाए तो क्या आप उसे अपनी अलमारी में रखेंगे? नहीं क्योंकि अब वह दूसरे की हो गयी। तो ऐसे ही जो चीज़ हमने बाबा को दे दी, वो दी हुई चीज़ फिर वापस नहीं ली जाती है। इसको पाप कहा जाता है। इसीलिए जो भी कुछ है बाबा को दे दिया फिर वापस नहीं लेना। नहीं तो इसका बहुत हिसाब-किताब बनता है । तो टीचर माना अपने को सदा एवररेडी रखना, आज भी विनाश हो जाये तो मैं तैयार हूँ! ऐसे नहीं थोड़ा-सा रहा हुआ है, कभी-कभी... लेकिन विनाश तो अचानक होना है। इसलिये बाबा कहते हैं अपनी कोई भी कमजोरी बाबा को दे दो, तो दी हुई चीज़ फिर आपके पास वापस आयेगी, तो भूल से भी वापस नहीं लेना । टीचर माना एक तो पहले निमित्त भाव, मैं- पन नहीं । थोड़ा ही भाषण बहुत अच्छा करते हैं तो समझते हैं मैंने तो, मैंने तो... अरे, बाबा ने कराया, तुमने क्या किया? तो मैं- पन नहीं हो इसके लिये बाबा कहते हैं निमित्त भाव हो । कुछ भी हुआ लेकिन अच्छाई में मैं-पन जरुर आता है, अच्छा किया तो दिल में आता जरुर है कि मैंने बहुत अच्छा भाषण किया, मेरे से जिज्ञासु बन गया। लेकिन बाबा ने टच किया या आपने किया ! आप तो निमित्त बनी ना, तो एक निमित्त दूसरा निर्मान क्योंकि आपस में इकट्ठे रहते हैं ना, उसमें एक जैसे भी होते हैं तो थोड़ा-सा आ जाता है ... मैं भी कम नहीं, यह अभिमान आ जाता है। और तीसरा निर्मल वाणी। कभी कभी वाणी से भी जो आता वो बोल देते हैं फिर कहेंगे मेरा भाव नहीं था लेकिन ऐसे ही बोल दिया। भाव था तभी तो निकला ना! तो यह तीन बातें बाबा ने अटेन्शन खिंचवाने के लिये कहा है, तो निमित्त भाव जरुर होना चाहिए। , ब्रह्मा बाबा को देखो इतनी अथॉरिटी होते भी, भले शिवबाबा है लेकिन साकार में तो ब्रह्मा बाबा ने सब किया ना, फिर भी यह कितना निर्मान है। बाबा ने कहा है, बाबा ने कहा है ... एक ही मुरली में कितने बारी बाबा बाबा कहता है। तो यह निमित्त भाव है ना और निमित्त भाव से निर्मान भाव आ जाता है। स्नेह भी आ जाता है, जो भी निर्मान होंगे उसको सभी प्यार करेंगे, यह उसकी निशानी है। उससे सबका दिल का प्यार होगा इसलिए यह तीन बातें जो बाबा की है निमित्त, निर्मान, निर्मल वाणी, टीचर्स के लिये बहुत आवश्यक है। तो रोज़ सुबह को बाबा से मिलने के बाद अपना लक्ष्य बनाओ कि आज मैं यह यह धारणा करूँगी और यह बनूँगी फिर रात में बाबा को रिजल्ट सुनाऊंगी। तो सहज हो जायेगा इसलिये यह सोचो, हमको अभी बाबा के समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनना ही है। ब्रह्मा बाबा को तो कॉपी करो ना । और कॉपी करो तो पहले करना पीछे नहीं। यह नहीं कि करके फिर पीछे सोचो, हो गया बाबा, ऐसा करता तो अच्छा था लेकिन हो गया तो हो गया... तो बन भी गया इसलिए करने के पहले ही चेक करो - ब्रह्माबाबा का यह संकल्प है? बोल है? कर्म है? पहले चेक करके पीछे करो तो सावधानी रहती है। तो ऐसे बाबा समान बन करके हमको बाबा के साथ ही जाना है। बराती बनके पीछे पीछे नहीं आना है। लेकिन साथ चलना है तो समान ही साथ होंगे ना । आजकल कोई साधारण मिनिस्टर भी होगा तो भी उसके हाथ में हाथ कौन देगा? जो उस जैसा । होगा, उसी को तो हाथ मिलायेगा ना। ऐसे ही कोई भी जाके पब्लिक से हाथ मिलायेगा क्या? तो हम भी बाबा के साथ चलेंगे तो समानता ही साथ का हाथ है इसलिए यह थोड़ा अटेन्शन में रखना। टीचर्स तो संदली पर बैठकर बाबा की मुरली सुनाती हैं । टीचर्स को बाबा कहते यह मेरे गुरुभाई हैं, बाबा ने यह टाइटल कितना अच्छा दिया है सब टीचर्स को । गुरु के भाई यानि बाबा के भाई हो गये हम टीचर्स । बाबा ने गुरुभाई क्यों कहा है? गुरु की जो गद्दी होती है उस पर कोई को बैठने नहीं देते और हम हर एक गुरु की गद्दी पर बैठते हैं। गुरु की गद्दी है मुरली सुनाने का स्थान। यह स्थान किसका होता है? जो मुरली सुनायेंगी, वैसे कोई जाके उस पर नहीं बैठता, मुरली सुनाने के टाइम बाबा को याद करके बैठके सुनाते हैं। तो कितना बड़ा टाइटल है " गुरुभाई ” । तो आप अपने को ऐसे टाइटल के नशे में बैठ करके मुरली सुनाती हो? जो भी टाइटल स्वमानों के रूप में बाबा ने दिये हैं, उस एक एक स्वमान को यूज़ करके लाभ उठाना चाहिए। आज सारे दिन में विशेष इस स्वमान में रह कर्म में आऊंगी, तो वैराइटी स्वमान से अनुभवों की खान बन जायेंगे। अगर वो चलन में नहीं आया तो उसे लाना पड़ेगा तभी तो साधारणता खत्म होगी और चेहरे से लगेगा कि यह कुछ है अद्भूत महसूस होने लगेगा। अच्छा।

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दादी जानकी जी की अनमोल शिक्षायें "

जो पढ़ाई की वैल्यु रखते वह अच्छी कमाई जमा करके दानी, महादानी, वरदानी बन जाते हैं" बाबा हमारी महिमा करके हमें महिमा योग्य बना रहा है । हम अपने मुख से अपनी महिमा नहीं करेंगे, पर बाबा ऐसा योग्य योगी बना रहा है। तो ऐसे मीठे बाबा की किन शब्दों में महिमा करें, शब्द हैं नहीं । अतीन्द्रिय सुख में रहना और स्वीट साइलेंस में रहना, इसमें पहले कौन-सा? जो थोड़ा उथल-पाथल में होता है वो अतीन्द्रिय सुख में नहीं रह सकता है। कभी सुखी रहता है, कभी थोड़ा दुःख की फीलिंग में आ जाता है तो वो स्वीट साइलेंस में कैसे जा सकता है! इसके लिये बाबा कहते राजयोगी का कोई भी देहधारियों से सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। जितना न्यारा 13-11-06 रहेंगे उतना प्यारा रहना सहज होगा । न्यारे रहने की विधि यथार्थ है तो अपने लिए और परिवार के लिए प्यार स्वतः होगा । बाहर वाले कहते छोटा परिवार सुखी परिवार और बाबा कहते हैं जितना बड़ा परिवार उतना सुखी परिवार है। हमारे इतने बड़े परिवार का संगठन देख दुनिया वाले खुश होते हैं। हम सब भगवान के बच्चे हैं, एक परिवार है। आपस में मिलकर रहने वाला परिवार है। हरेक स्वतन्त्र है, अपने पैर पर खड़ा है इसलिए इतना बड़ा परिवार होते भी किसी पर कोई बोझा नहीं है। तो हम किसके हैं और हमारा कौन है ? यह नशा हम सबको है । हम यहाँ सब धर्म, जाति, रंग, भाषा से परे रहने की, भेदभाव को मिटाने की सेवा कर रहे हैं। एक बाप की श्रीमत पर चलने से कितना हम सुधर रहे हैं, सम्पूर्ण बने नहीं हैं परन्तु सम्पूर्ण बनने के बिगर और कुछ करना ही नहीं है। समय अनुसार हम बनेंगे तो और बनेंगे। हम सुधर रहे हैं तो दुनिया भी सुधर रही है। तो हमारी तात, लात और बात यही है, सेवा भी यही है। अपनी स्थिति ऐसी बनाकर रखने की तात है, औरों को सुनाने की लात (लत-आदत) है और कोई बात है ही नहीं । कई भाई बहनें बाबा का नाम लेकर अपना काम उतार देते हैं क्योंकि वो अपनी बुद्धि से काम लेते हैं तो ऐसी आत्मायें बाबा से शक्ति नहीं खींच सकती हैं। अभिमान वाली बुद्धि होने के कारण बाबा की इतनी ऊंची मीठी बातें बुद्धि में ग्रहण नहीं होती । अनेक बातों में जहाँ जरुरत नहीं वहाँ भी अपनी बुद्धि चला लेते हैं। नेचर और किसकी, बुद्धि अपनी चला देते हैं। उस घड़ी ये नहीं समझते हैं कि यह व्यर्थ है । थोड़ा भी अन्दर व्यर्थ है तो समर्थ संकल्प रह नहीं सकता । व्यर्थ, बाबा की शक्ति से वंचित कर देता है। एक ही टाइम पढ़ाई भी हो, कमाई भी हो और दान भी करो। पढ़ाई में कमाई नहीं की, पढ़ाई का फायदा नहीं लिया। पढ़ाई पढ़के टीचर बना तो क्या बड़ी बात की? टीचर का जॉब क्या होता है? इतना ऊंचा बाबा हमको पढ़ाता और हम भी केवल टीचर ही बने तो क्या बड़ी बात की ! बाबा खुश किसमें होगा? जिसको ऊंच पद पाने की धुन लगी हुई है, बाबा उनको अन्दर से बहुत प्यार करता है। टीचर भी समझता है कि होमवर्क अच्छा करता है, औरों को भी मदद करता है। कोई पढ़ाई में आगे जाता है तो उसको जैलसी नहीं होती है, खुशी होती है, हम मिल करके पढ़ रहे हैं। तो खुद पढ़ाई में होशियार बन अन्य साथियों को भी सहयोग दे उनको आप समान लायक बनाना है । हमारे अन्दर पढ़ाई की वैल्यु है तो कमाई स्वतः होती है और जिसकी कमाई अच्छी होती है वो दानी, महादानी, वरदानी बन जाता है। , संगमयुग के इस पार्ट में हमें गंगा, जमुना और सरस्वती बनना है। गुप्त रूप में सरस्वती बनने बिगर पतित-पावनी गंगा बन नहीं बनेंगे। जमुना के कंठे पर राज्य नहीं कर सकेंगे। तो जो सदा मात-पिता को सामने रखते हैं वो सुख घनेरे पाते हैं, उनको अल्पकाल का सुख भासता ही नहीं है इसलिए वो सुख उन्हें चाहिए ही नहीं। जिसको इच्छाओं की अविद्या है वो महान श्रेष्ठ आत्मा है। अल्पकाल के सुख की इच्छा के लिए इतना बड़ा भाग्य गँवाना, यह कितना दुर्भाग्य है। तो एक मात-पिता की पत्र पुष्प मई 2026, अंक - 406 कृपा हो तो उसको और कुछ नहीं चाहिए । बाबा भी हमारे ऊपर पहले दया करता, फिर रहम, , फिर कृपा करता। दया की जो गोद बिठाया, रहम ने दिल पर बिठाया फिर कृपा हमारे सिर पर है। कृपा मात-पिता की, दया स्वयं ईश्वर की, बाबा के पास कितने खोटे कर्म करके आये फिर भी बाबा रहमदिल बन करके अपना बनाके हमको शिक्षा दे दे करके सुधार देता है। यह बाबा का रहम है, कृपा से पढ़ाई अच्छी पढ़ रहे हैं। उसकी कृपा न होवे तो दिमाग काम नहीं कर सकता है। वो ऊंटपक्षी की तरह होंगे। अभी सत्य बाबा से सत्य नारायण की कथा सुनते-सुनते हमारी बुद्धि ठीक काम करने लगी है। पहले भी सत्यनारायण की कथा सुनते थे, पर अर्थ का पता नहीं था। अभी हमको सत्कर्म करके ऐसा शालिग्राम बनना है जो शिव के साथ हमारी पूजा हो सके। सत्यनारायण की कथा बताती है कि तुम सच्चे बनो तो नर से श्री नारायण, नारी से श्रीलक्ष्मी बनेंगे। नारायण लक्ष्मी से अलग नहीं है, लक्ष्मी, नारायण से अलग नहीं है। बाबा ने हमें लक्ष्य ही दिया है विष्णु (लक्ष्मी-नारायण) बनने का। मनमनाभव में बुद्धि ऊपर जाती है, मध्याजीभव होने से हर समय लक्ष्य सामने रहता है । विष्णु कहने से चार भुजा याद आती है, सिर्फ नारायण कहने से नहीं याद आती है। किसी को विष्णुपुरी में आना है, विष्णुवंशी बनना है, सतयुग में आना है तो चार भुजाधारी बनना है। पहले है चक्र स्वदर्शन का, फिर गदा ज्ञान- योग की पराकाष्ठा का, फिर कमल का फूल एकदम न्यारा, रचना है परन्तु न्यारा है बहुत। जब इतना न्यारापन हो तब शंखध्वनि कर सके। इसका प्रैक्टिकल प्रमाण चाहिए। औरों को देखकर मैं भी यह बन सकता हूँ, यह उनके अन्दर में संकल्प हो। तो पुरानों को अभी समय का कदर करके बाबा को सबूत देना है। अभी भी सबूत देने का ख्याल नहीं आयेगा तो क्या होगा? कई आत्माओं को वरदाता का वरदान है। स्वराज्य पद पाने के पहले वर्सा, , वरदान याद रखना है। बाबा ने जो दिया है उससे सेवा ऑटोमेटिक होती रहे । व्यर्थ सोचने, बोलने, समय गँवाने से ऐसी सेवा नहीं हो सकती है इसलिए सच्चा सेवाधारी बनना है तो स्वयं पर ध्यान रखना है। अभी योग में एक सेकेण्ड के अन्दर बुद्धि इतनी शान्त हो जाये जो स्वीट साइलेंस में चली जाये, फिर वो वायुमण्डल भी सबको अच्छा लगेगा। अच्छा।

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". दादी प्रकाशमणि जी के अमृत वचन "

व्यर्थ संकल्प और समय गंवाने के बजाए सदा शुभ सोचो, सबके प्रति कल्याण की भावना रखो '

1) जब हम सम्पन्नता का सोचते हैं तो हमारा अटेन्शन जाता, सम्पन्न बनना अर्थात् कर्मातीत बनना। तो हम सम्पन्न बनें अर्थात् बाप समान बनें, कर्मातीत बनें। तो हमारे पुरुषार्थ का अन्तिम पेपर भी कर्मातीत बनना है। तो कर्मातीत बन रहे हैं या कोई सूक्ष्म कर्म के खाते बन तो नहीं रहे हैं? अगर संकल्प व्यर्थ जाते तो क्या वह व्यर्थ संकल्प हमें कर्मातीत बनायेगा? व्यर्थ संकल्प से समय भी वेस्ट, संकल्प श्वांस भी वेस्ट, शक्ति (एनर्जी) भी वेस्ट तो कर्मातीत कैसे बनेंगे ।

2) तो ध्यान रखना है कि हमारी दिनचर्या में किसी प्रकार का भी स्वयं के प्रति अथवा दूसरों के प्रति व्यर्थ संकल्प न चले। हम आये हैं स्वयं की गति सद्गति करने, तो हमारा दूसरों के पीछे समय क्यों वेस्ट हो, इसलिए न श्वांस वेस्ट करो, न समय, न संकल्प । बाबा ने हम सबको टाइटल दिया है सर्व के शुभचिंतक । तो सबके प्रति शुभ भावना रखो, शुभ सोचो, कल्याण की भावना रखो।

3) अगर कारणे अकारणे कोई भी कुछ करता उसके लिये भी हमारा संकल्प चलता, तो उसमें भी हमारी एनर्जी वेस्ट जाती। तो अब बाबा ने हम सबको सम्पन्नता का इशारा दिया है इसलिए कोई भी संकल्प व्यर्थ नहीं होना चाहिए । हरेक का ड्रामा में अपना-अपना पार्ट है, हमें हर बात के पीछे शुभ सोचना है और शुभ भावना रख कार्य - व्यवहार में भी शुभ वृत्ति को अपनाना है। शुभ भावना ही हमारी मुख्य सेवा है। और सेवा न भी करें, शुभ भावना रखें तो भी चारों तरफ अच्छे वायब्रेशन फैलते रहेंगे।

4) हर एक को शुभ भावना, शुभ कामना देना अर्थात् सूक्ष्म दुआयें देना जिसको बाबा ने कहा है दुआ देना अर्थात् दाता बनना। तो हमें दाता बनके दुआयें देनी और लेनी है। दुआयें सिर्फ देनी नहीं होती परन्तु रिटर्न में दुआयें आटोमेटिक मिलती हैं।

5) अगर कोई प्रैक्टिकल हमसे अनुभव पूछे तो मैं कहती कि बाबा ने मुझे दुआओं में पाला है और दुआओं से आगे बढ़ाया है। " हमें सबकी दुआयें मिलती इससे बड़ा और क्या वरदान है। दुआयें ही वरदान हैं। उन दुआओं का आधार है सदा सर्व के लिये शुभ सोचना, और शुभ सोचने वाले में " मैं मैं मैं" नहीं रहती। आप आप आप। मैं, मैं करने से दुआ के बदले दूसरों से बहुआ मिलती, शुभ भावना से आप आप करो तो दुआयें मिल जाती। तो हम हैं दाता के बच्चे, हमें देना है न कि लेना है। सब देना सीखो, देने में स्वतः मिल जाता माना लेना होता है।

6) बाबा ने हमें मन्त्र दिया है - निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनो। यही अन्तिम महावाक्य याद रखो तो सम्पन्न बन विजय माला के रत्न बन जायेंगे। हमें बाबा के गले का विजयी रत्न बनना है इसलिए सम्पन्नता माना विथ ऑनर्स पास होना अर्थात् कर्मातीत बनना । तो मैं मन, वचन, कर्म से, दृष्टि वृत्ति से बाप के समान कल्याणकारी हूँ? हमारे सामने साकार बाबा एक्जाम्पुल है। तो बाबा को फालो करते करते हम बाबा के समान फरिश्ता बनेंगे। तो यह सम्पन्नता की स्थिति का पुरुषार्थ करने से जो कभी कभी उदासी या टेन्शन आदि होता वह सब खत्म हो जायेगा।

7) कई बार बाबा हमें समय की सूचना देते कि बच्चे समय को देखते हो, तो तुमको बेहद का वैरागी अथवा उपराम रहना है। जितना बेहद के वैरागी, त्यागी बनेंगे अर्थात् उपराम रहेंगे, उतना आटोमेटिकली हमारी याद की यात्रा पावरफुल होती जायेगी। यह अशरीरी बनने का अभ्यास सम्पन्न बनने में हमें बहुत मदद करता है।

8) बाबा अभी हम बच्चों को उड़ती कला का वरदान देके उड़ाके ले जाना चाहते हैं। उड़ने के बिना, अब पैदल चलने की बात खत्म। उड़ो, उड़ाओ, उड़ते चलो बस। अभी पैदल, मेहनत से नहीं चलना है परन्तु उड़ती कला में उड़के जाना है। जब उड़ती कला में उड़ेंगे तब ही सम्पन्नता के समीप सहज आयेंगे। जब प्लेन उड़ जाता तो बाकी सब नीचे रह जाते। बादलों से भी पार हो जाते। तो हमें सब बातों रूपी बादलों से पार जाना है, सम्पन्नता अर्थात् उड़ती कला में उड़ने का इशारा है। उड़ना है, उड़ाना है और पार जाना है। अच्छा। ओम् शान्ति।